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पुराण और उनके विवरण (18 puranas with details)

सनातन धर्म में पुराणों का महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। यह हमें ईश्‍वर के स्‍वरूपों और उनकी लीलाओं के द्वारा उनकी महिमा और जीवन के सिद्धांतों का ज्ञान देते हैं।

पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ है ।

उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं।

वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम सरल भाषा में समझाया गया है। 

पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं। हिंदू धर्म में पुराणों की कुल संख्‍या 18  है।

इनमें ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश का वर्णन किया गया है। त्रिदेवों में प्रत्‍येक को 6-6 पुराण समर्पित किये गए हैं। इनका संकलन महर्षि वेद व्‍यास ने देववाणी संस्‍कृत में किया है।

सनातन धर्म (हिन्दू धर्म )के बहुत ही महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग हैं। पुराण वेद, मनु, स्मृति जैसे ग्रंथो से बिलकुल तो नहीं पर उनसे थोड़े हटके ग्रन्थ हैं इसमें वैदिक काल से हुई राजाओं, भगवान्, और ऋषिओं की घटनाओ की रोचक और मन को मोह लेने वाली घटनाओं का वर्णन मिलता है।

पुराणों मैं भक्ति भाव से जुडी कई कड़ियों का भी वर्णन मिलता है। हम किस पूजा को किसलिए करते हैं और उस पूजा के होने के पीछे का कारण और उसकी कथा का सम्पूर्ण विवरण हमें पुराणों से प्राप्त हो जाता है।

हर पुराण को अलग कारणों से लिखा गया है।कई पुराणों मैं केवल भगवान् की पूजा के बारे मैं उचित विवरण मिलता हैं तो कुछ मैं राजाओं और ऋषियों के जीवन मैं हुई घटनाओं और उनसे जुडी रोचक कथाओं का विवरण भी मिलता हैं।

यदि किसी को किसी पूजा मैं होने वाली विधि विधान का कारण जानना है तो उसे पुराणों का ही अध्ययन करना चाहिए। इन पुराणों मैं तो न केवल ईश्वर, राजाओं, और ऋषियों का बल्कि इस संसार की रचना से लेकर इस संसार के विनाश की भी पूरी व्याख्यान मिलता है।

पुराणों मैं इस संसार के भौगोलिक स्थिति और राशि विज्ञान व हमारे सामन्य विज्ञान से जुडी भी चीज़ों का भी ज्ञान मिलता है। पुरे ब्रह्माण्ड की संरचना किस प्रकार हुई और किसने की ये सब कुछ पुराणों मैं मिलता हैं।

इस संसार की संरचना से लेकर इसको कौन चलाता है कैसे चलाता है इसका भी पूरा प्रमाण पुराणों में मिलता है। पुराण की संरचना हमारे ऋषि मुनियों द्वारा की गयी और ये हमें दिया गया एक अनमोल उपहार है।

ये हमें बताते हैं की हमारा सनातन वैदिक धर्म कितना सुंदर और स्वच्छ है।

18 पुराणों के नाम इस प्रकार है (Name of 18 puranas in hindi) :

  1. ब्रह्म पुराण (Brahma Purana)
  2. पद्म पुराण (Padma Purana)
  3. विष्णु पुराण (Vishnu Purana)
  4. शिव पुराण (Shiva Purana)
  5. भागवत पुराण (Bhagavata Purana)
  6. नारद पुराण (Narada Purana)
  7. मार्कण्डेय पुराण (Markandeya Purana)
  8. अग्नि पुराण (Agni Purana)
  9. भविष्य पुराण (Bhavishya Purana)
  10. ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahmavaivarta Purana)
  11. लिंग पुराण (Linga Purana)
  12. वाराह पुराण (Varaha Purana)
  13. स्कन्द पुराण (Skanda Purana )
  14. वामन पुराण (Vamana Purana)
  15. कूर्म पुराण (Kurma Purana)
  16. मत्स्य पुराण (Matsya Purana)
  17. गरुड पुराण (Garuda Purana)
  18. ब्रह्माण्ड पुराण (Brahmanda Purana)

जानिए क्या है वेद और उपनिषद

1 ब्रह्म पुराण (Brahma Purana)

ब्रह्म पुराण को आदिपुराण और प्रथम पुराण के रूप में जाना जाता है।

ब्रह्मपुराण सब से प्राचीन है। ब्रह्म पुराण मैं 246 अध्याय हैं और 10,000 श्लोक हैं।

इसमें मुख्‍य रूप से सृष्टि रचयिता ब्रह्मा की उत्‍पत्ति की कथा मिलती है। इसमें सृष्टि के जन्म, मनु की उत्‍पत्ति, वंश वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्‍पत्ति का वर्णन मिलता है।

पुराण मैं जल के अस्तित्व और वायु के महत्व के बारे मैं बहुत सुन्दर तरीके से वर्णित किया गया है। इसमें सूर्य देव और चंद्र देव के वंशजों का भी वर्णन मिलता हैं।

इस पुराण को वक्‍ता और श्रोता के माध्‍यम से वर्णित किया गया है। इसमें ब्रह्मा जी वक्‍ता और ऋषि मरीचि बतौर श्रोता उपस्थित हैं। विद्वान कहते हैं कि इस पुराण के श्रवण से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से मुक्ति मिलती है।

इसमें पुरुष वंश के वर्णन से मानव विकास को बताया गया है।प्रथम ब्रह्म पुराण मैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी और श्री कृष्ण जी के चरित्र को भी समझाया गया है।

इसमें कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनि का भी वर्णन मिलता है। इसमें तीर्थों के महत्व और उनके बारे मैं पूरा विवरण मिलता है इसमें भक्ति भाव और पूजा विधि का बहुत सुन्दर और उचित रूप से दर्शाया गया है।

ब्रह्म पुराण में कलयुग के शुरू होने से लेकर अंत तक का संपूर्ण विवरण है।कहा जाता है की इसे व्यास मुनि ने सबसे पहले लिखा था और ब्रह्म को सर्वश्रेष्टा बताया है। 

इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं।

इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है ।

इसमें शिव पार्वती का विवाह, कृष्णा लीला, विष्णु पूजा, श्रद्धा कर्मा और विष्णु अवतार का पूरा विवरण उपस्थित है।

2 पद्म पुराण (Padma Purana)

पद्म सै आशय कमल के फूल से है। ब्रह्मा जी श्री हरि के नाभि कमल से उत्‍पन्‍न हुए थे और उनकी आज्ञा से सृष्टि की रचना का कार्य संपन्‍न किया था।

इसलिए इसे पद्म पुराण की संज्ञा दी गई। इसमें भगवान विष्‍णु की संपूर्ण महिमा का अप्रतिम बखान है। पद्म पुराण मैं विष्णु जी की कई महिमाओं, कथा कहानियों का वर्णन मिलता है।

इसमें विष्णु जी के दोनों अवतारों श्री कृष्णा और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चंद्र जी का भी वर्णन मिलता है। इसमें तुलसी की महिमा और व्रत त्योहारों का बहुत ही सुन्दर वर्णन मिलता है।

पद्म पुराण मैं सृष्टि के रचियेता यानि ब्रह्मा जी द्वारा विष्णु जी के जन्म और विष्णु जी को दिए गए दायित्वो को बताया गया हे।इसके अलावा इसमें श्रीराम और श्रीकृष्‍ण के रूपों और लीलाओं का अद्भुत वर्णन मिलता है।

इसके अलावा इस पुराण में पृथ्‍वी, आकाश और नक्षत्रों की उत्‍पत्ति के विषय की जानकारी मिलती है।

पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह ग्रंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं।

इस पुराण में यह बताया गया है कि चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणी में रखा गया है।

यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है।

शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था।

3 विष्णु पुराण (Vishnu Purana)

विष्‍णु पुराण की रचना श्री पराशर ऋषि ने की है। इसमें भगवान विष्‍णु को नित्‍य, अक्षय और एकरस माना गया है।

इसमें भगवान् श्री कृष्णा और शिव जी के सम्बंद को बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है।

इसमें आकाश, भूत, समुद्र, सूर्य, देवताओं की उत्‍पत्ति, कल्‍प विभाग, सभी धर्म, एंव देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का वर्णन मिलता है।

संक्षेप में राम कथा का भी उल्‍लेख है। विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं।

इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है।

भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।)

भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है।

भगवान विष्णु के 24 अवतार (24 Avatars of Lord Vishnu)

4 शिव पुराण (Shiva Purana)

शिवपुराण को सभी पुराणों मैं एक विशेष स्थान प्राप्त है।

शिवपुराण में भोलेनाथ की महिमा का उल्‍लेख मिलता है।

शिव पुराण का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है।

प्राय: सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या,वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है।

इसमें उनके अलग-अलग स्‍वरूपों, ज्‍योर्तिलिंगों, भक्‍तों और भक्ति के प्रति उनके भाव का वर्णन किया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि शिव का केवल नाम ही नहीं भोले है वह वाकई बहुत ही भोले हैं।

इसमें बताया गया है की शिव जी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देव है और वे किसी एक के नहीं हैं वे सबके हैं। वे मनुष्य  और अपने भक्‍तों पर बड़ी ही सहजता से प्रसन्‍न हो जाते हैं।

इसके अलावा शिव विवाह, उनके पुत्र सहित उनके संपूर्ण चरित्र का वर्णन मिलता हशिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है।

इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं।

इस में कैलाश पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है।

सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं|

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shree Somnath Jyotirlingas)

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5 भागवत पुराण (Bhagavata Purana)

विद्वान बताते हैं कि जब वेदव्‍यास जी ने पुराणों की रचना की तो उनके मन में बड़ी बेचैनी थी।

उन्‍होंने जब देवर्षि नारद से इसका कारण जाना तो नारदमुनि ने कहा कि उन्‍होंने हर विषय का पुराण लिखा लेकिन प्रेम के विषय में यानी कि कृष्‍ण राधा के प्रेमावतार के विषय में नहीं लिखा तो इस तरह महर्षि वेद-व्‍यास जी ने भागवत पुराण की रचना की।

श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मय का मुकुटमणि है। भगवान शुकदेव द्वारा महाराज परीक्षित को सुनाया गया भक्तिमार्ग तो मानो सोपान ही है।

इसके प्रत्येक श्लोक में श्रीकृष्ण-प्रेम की सुगन्धिहै।साधन-ज्ञानसिद्धज्ञान,साधन-भक्ति,सिद्धा-भक्ति,मर्यादा-मार्ग,अनुग्रह-मार्गद्वैत, अद्वैत समन्वय के साथ प्रेरणादायी विविध उपाख्यानों का अद्भुत संग्रह है।

इसमें देवों के देव श्री कृष्‍ण के जन्‍म, प्रेम की नई परिभाषा, महाभारत युद्ध में उनकी भूमिका, देहत्‍याग, द्वारिका नगरी के जलमग्‍न होने और यदुवंशियों के नाश का संपूर्ण विवरण मिलता है।

भागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है।

विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं।

भागवत  पुराण को 18 पुराणों मैं एक बहुत ख़ास स्थान पर रखा जाता है। भागवत पुराण भारत मैं सबसे अधिक पड़ी जाने वाला पुराण है।

6 नारद पुराण (Narada Purana)

नारद पुराण को महापुराण भी कहा जाता है। इसमें सभी 18 पुराणों (purana) का सार दिया गया है। इसमें ज्‍योतिष, मंत्र सिद्धि, मृत्‍यु पश्‍चात के क्रिया-कर्म आदि का विधान दिया गया है।

इसके अलावा संगीत के सभी सात स्‍वर, शुद्ध और कूट तानों के साथ ही स्‍वर मंडल के ज्ञान का वर्णन किया गया है। नारद जी ने स्वयं ही सुनाया है और इसे साक्षात् विष्णु भगवान् की वाणी कहा है।

नारदपुराण में शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, और छन्द-शास्त्रोंका विशद वर्णन तथा भगवान की उपासना का विस्तृत वर्णन है।

नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इसके प्रथम भाग में गंगा अवतरण की कथा  विस्तार पूर्वक दी गयी है।

दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध एवं कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है।

संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थ्योरी का विकास शून्य के बराबर था।

मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं कहा गया है की अगर किसी को पाप मुक्त होना है तो उसे अवश्य ही नारद पुराण का पाठ करना चाहिए और नारद पुराण के पाठ मात्रा से ही व्यक्ति के सारे पाप मिट जाते है और उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

7 मार्कण्डेय पुराण (Markandeya Purana)

मार्कण्‍डेय पुराण को प्राचीनतम पुराण माना गया है। इसमें सभी वैदिक देवताओं इंद्र, अग्नि और सूर्य सहित अन्‍य का उल्‍लेख किया गया है।

इसमें गृहस्‍थ धर्म, श्राद्ध, नित्‍यकर्म, व्रत, उत्‍सव, अनुसूइया के पतिव्रता होने की कथा, देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन मिलता है।

मार्कण्‍डेय पुराण में श्रीकृष्‍ण से जुड़ी हुई कथाओं का भी उल्‍लेख मिलता है।अन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं।

इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है।

भगवती की विस्तृत महिमा का परिचय देने वाले इस पुराण में दुर्गासप्तशती की कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्र की कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूया की कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओं का विस्तृत वर्णन है।

इसमें इन कथाओं का इस प्रकार वर्णन किया गया है की सुनने वाला बिलकुल मंत्र मुग्ध हो जाता है। इसमें व्यक्ति को सत्य और असत्य का भेद समझाया गया है।

8 अग्नि पुराण (Agni Purana)

अग्नि पुराण वक्‍ता और श्रोता पर आधारित है। इसमें वक्‍ता  भगवान अग्निदेव हैंऔर श्रोता वशिष्‍ठ हैं। इसीलिए इसे अग्नि पुराण की संज्ञा दी गई।

पद्म पुराण में भगवान् विष्‍णु के पुराणमय स्‍वरूप का वर्णन किया गया है और अठारह पुराण भगवान के 18 अंग कहे गए हैं।

उसी पुराणमय वर्णन के अनुसार ‘अग्नि पुराण’ को भगवान विष्‍णु का बायां चरण कहा गया है।

विषय की विविधता एवं लोकोपयोगिता की दृष्टि से इस पुराण का विशेष महत्त्व है। अनेक विद्वानों ने विषयवस्‍तु के आधार पर इसे ‘भारतीय संस्‍कृति का विश्‍वकोश’ कहा है।

 इसमें विष्‍णु के अवतारों सहित शिवलिंग, दुर्गा, गणेश, सूर्य, प्राण प्रतिष्‍ठा आदि का वर्णन मिलता है।

इसके अलावा इसमें भूगोल, गणित, ज्‍योतिष, विवाह, मृत्‍यु, शकुन विद्या, वास्‍तु विद्या, दिनचर्या, नीति शास्‍त्र, युद्ध विद्या, धर्म शास्‍त्र, छंद, काव्‍य, व्‍याकरण और आयुर्वेद का महासागर है अग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। 

इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं।

धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है अत्‍यंत लघु आकार होने पर भी इस पुराण में सभी विद्याओं का समावेश किया गया है।

इस दृष्टि से अन्‍य पुराणों की अपेक्षा यह और भी विशिष्‍ट तथा महत्‍वपूर्ण हो जाता है।अग्नि पुराण में ब्रह्मा विष्णु एवं शिव तथा सूर्य की पूजा उपासना का भी वर्णन किया गया है।

9 भविष्य पुराण (Bhavishya Purana)

भविष्‍य पुराण में सूर्य का महत्‍व और वर्ष के 12 महीनों के निर्माण का उल्‍लेख मिलता है। इस पुराण में सांपों की पहचान, विष और विषदंश की संपूर्ण जानकारी दी गई है।

सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है। भविष्य पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले  नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है।

ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इसके साथ ही विक्रम बेताल और बेताल पच्‍चीसी की कथाएं भी इसी का हिस्‍सा हैं।

भविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। 

इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती है।इसमें सूर्य चन्द्रमा से लेकर भविष्य मैं होने वाले मौसम के बदलाव का भी विवरण दिया गया है।

10 ब्रह्मवैवर्त पुराण (Brahmavaivarta Purana)

ब्रह्मवैवर्त पुराण18 पुराणों मैं सबसे प्राचीन पुराण माना जाता है। इसमें ब्रह्मा जी द्वारा समस्त सृष्टि की रचना का वर्णन मिलता है। इसमें धरती, जल, और वायु के बनाने से लेकर इनके होने के कारण का पूर्ण विवरण मिलता है।

इसमें जल वायु और धरती मैं रहने वाले जीव जंतु के लालन पालन की व्यवस्था का वर्णन मिलता है। पुराण में ब्रह्मवैवर्त शब्द का अर्थ है- ब्रह्म का विवर्त अर्थात् ब्रह्म की रूपान्तर राशि।

ब्रह्म की रूपान्तर राशि ‘प्रकृति’ है। प्रकृति के विविध परिणामों का प्रतिपादन ही इस ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में प्राप्त होता है। कहने का तात्पर्य है प्रकृति के भिन्न-भिन्न परिणामों का जहां प्रतिपादन हो वही पुराण ब्रह्मवैवर्त कहलाता है।

विष्णु के अवतार कृष्ण का उल्लेख यद्यपि कई पुराणों में मिलता है, किन्तु इस पुराण में यह विषय भिन्नता लिए हुए है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में कृष्ण को ही ‘परब्रह्म’ माना गया है, जिनकी इच्छा से सृष्टि का जन्म होता है।

‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में श्रीकृष्ण लीला का वर्णन ‘भागवत पुराण’ से काफी भिन्न है। ‘भागवत पुराण’ का वर्णन साहित्यिक और सात्विक है जबकि ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ का वर्णन श्रृंगार रस से परिपूर्ण है।

इस पुराण में सृष्टि का मूल श्रीकृष्ण को बताया गया है इसमें कृष्णा जी की लीला का वर्णन, राधा जी की गोलोक लीला का वर्णन भी बहुत सुंदरता से दर्शाया गया है।

इस पुराण में चार खण्ड हैं। ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। यह वैष्णव पुराण है इस पुराण में 18000 श्लोकों बताया गया है।

11 लिंग पुराण (Linga Purana)

लिंग पुराण को विशिष्‍ट पुराण की संज्ञा दी गई है। इसमें शिव के 28 अवतारों का संपूर्ण वर्णन मिलता है। दो भागों में विभक्‍त इस पुराण को सुनने से मनुष्‍य के सभी पाप अपने आप नष्‍ट हो जाते हैं।

जीव जीवन-मरण के भय से मुक्‍त होकर शिव में लीन हो जाता है। इसमें लिंगोद्भव और रुद्रावतार की भी कथा मिलती है।

कहते हैं इस पुराण का श्रवण करने से मृत्‍यु के समय कष्‍ट नहीं भोगना पड़ता और शिवधाम की प्राप्ति होती है।

लिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है।

राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है।यह समस्त पुराणों में श्रेष्ठ है। वेदव्यास कृत इस पुराण में पहले योग फिर कल्प के विषय में बताया गया है।

12 वराह पुराण (Varaha Purana)

भगवान विष्‍णु के वराह अवतार पर ही वराह पुराण रचा गया।

इसमें भगवान के वराह रूप में अवतरित होने संबंधी सभी कथाओं के साथ अनेक तीर्थ, व्रत ,यज्ञ , दान आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है।

इसमें भगवान नारायण का पूजन विधान, शिव पार्वती की कथाएं, तीर्थों की महिमा,मोक्षदायिनी नदियों की उत्पत्ति और महादेव की महिमा आदि पर भी विशेष प्रकाश डाला गया है इसे सुनने से जीवन के सभी कष्‍टों का निवारण होता है।

इसके अलावा भगवत गीता का भी इसमें उल्‍लेख किया गया है। वराह पुराण में श्राद्ध पद्वति, सूर्य के उत्‍तरायण, दक्षिणायन, अमावस्‍या और पूर्णमासी का उल्‍लेख मिलता है।वराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं।

इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता माहात्म्य का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। ।

महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले

13 स्कन्द पुराण (Skanda Purana )

स्‍कन्‍द पुराण शिव जी के बड़े पुत्र कार्तिकेय के नाम पर लिखा गया है। उनका ही नाम स्‍कन्‍द है। इसका अर्थ होता है विनाश या क्षरण।

कार्तिकेय जी को भी संहारक शस्‍त्र और शक्ति के रूप में जाना जाता है। है।इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञान के अनन्त उपदेश भरे हैं।

कार्तिक मास महात्मय त्यौहार पूर्णिमा एव देवउठनी एकादशी

इसमें धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्ति के सुन्दर विवेचन के साथ अनेकों साधु-महात्माओं के सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं।

इसमें 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, भारत के 12 ज्‍योर्तिलिंगों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, गंगा अवतरण के आख्यान सहित पर्वत श्रृंखलाओं का उल्‍लेख मिलता है।

इसमें कन्‍याकुमारी मंदिर के साथ, सोमदेव, तारा, उनके पुत्र बुध ग्रह की उत्‍पत्ति की कथा मिलती है स्कन्द पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं।

इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है।इसमें बद्रिकाश्रम, अयोध्या, जगन्नाथपुरीरामेश्वरम, कन्याकुमारी, प्रभास, द्वारका, काशी, कांची आदि तीर्थों की महिमा; गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों के उद्गम की मनोरथ कथाएँ; रामायण, भागवतादि ग्रन्थों का माहात्म्य, विभिन्न महीनों के व्रत-पर्व का माहात्म्य तथा शिवरात्रि, सत्यनारायण आदि व्रत-कथाएँ अत्यन्त रोचक शैली में प्रस्तुत की गयी हैं।

विचित्र कथाओं के माध्यम से भौगोलिक ज्ञान तथा प्राचीन इतिहास की ललित प्रस्तुति इस पुराण की अपनी विशेषता है।

14 वामन पुराण (Vamana Purana)

वामन पुराण श्री हरि विष्‍णु के वामन अवतार पर आधारित है। इसमें वामन अवतार, शिवलिंग पूजा, गणेश, स्‍कन्‍द आख्‍यान, शिव-पार्वती की कथा का उल्‍लेख मिलता है।

इसके अलावा इसमें नर-नारायण, भगवती दुर्गा, प्रह्लाद, श्रीदामा, शिव लीला चरित्र, कामदेव दहन, हरि का कालरूप, लक्ष्‍मी चरित्र सहित विभिन्‍न व्रत और स्‍तोत्र का वर्णन मिलता है।

वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उपलब्ध है।

इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है।

इसके अतिरिक्त, शिवजीका लीला-चरित्र, जीवमूत वाहन-आख्यान, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस, हरिका कालरूप, कामदेव-दहन, अंधक-वध, लक्ष्मी-चरित्र, प्रेतोपाख्यान, विभिन्न व्रत, स्तोत्र और अन्त में विष्णुभक्ति के उपदेशों के साथ इस पुराण का उपसंहार हुआ है।

15 कुर्मा पुराण (Kurma Purana)

पुराण में चारों वेदों का संपूर्ण सार मिलता है। मंथन के समय मंदराचलगिरि को समुद्र में स्थिर रखने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्‍णु ने कूर्मावतार धारण किया था।

इसमें उनके उस अवतार में दिए गए उपदेशों का वर्णन मिलता है। साथ ही ब्रह्मा, विष्‍णु, शिव, पृथ्‍वी और गंगा की उत्‍पत्ति का भी उल्‍लेख मिलता है।

कूर्म पुराण में मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों की भी जानकारी मिलती है।इसमें विष्णु और शिव की अभिन्नता कही गयी है। पार्वती के आठ सहस्र नाम भी कहे गये हैं।

काशी व प्रयाग क्षेत्र का महात्म्य, ईश्वर गीता, व्यास गीता आदि भी इसमें समाविष्ट हैं।कुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है।

कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा  विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है।

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16 मत्‍स्‍य पुराण (Matsya Purana)

मत्‍स्‍य पुराण का संबंध भगवान विष्‍णु के मत्‍स्‍य अवतार से है। इसमें जल प्रलय से लेकर कलियुग के राजाओं की सूची दी गई है।

श्री हरि विष्‍णु बताते हैं कि इस पुराण को श्रवण करने से मनुष्‍य की कीर्ति में वृद्धि होती है। आयु भी बढ़ती है।

इसके अलावा मनुष्‍य सभी पापों से मुक्‍त होकर श्री नारायण में लीन हो जाता है।

मतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है।

सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है।

कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में हैइसमें जल प्रलय, मत्स्य व मनु के संवाद, राजधर्म, तीर्थयात्रा, दान महात्म्य, प्रयाग महात्म्य, काशी महात्म्य, नर्मदा महात्म्य, मूर्ति निर्माण एवं त्रिदेवों की महिमा आदि पर भी विशेष जोर दिया गया है।

17 गरुड़ पुराण (Garuda Purana)

पुराण में 84 लाख योनियों के नरक स्‍वरूपी जीवन के विषय में बताता है। इसमें भगवान विष्‍णु के अलग-अलग अवतारों का वर्णन मिलता है।

मृत्‍यु के बाद आत्‍मा की दशा का उल्‍लेख मिलता है। पूजन, तप और मंत्रों का भी वर्णन मिलता है। इसके साथ ही धर्म शास्‍त्र, नीतिशास्‍त्र, ज्‍योतिष शास्‍त्र और योग का वर्णन मिलता है।

गरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है।

इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्योंकि इस ग्रंथ को किसी परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है।

वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है।

समस्त यूरोप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी।

इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिये अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है।

इसके अतिरिक्त इस पुराण मेंश्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है।

18 ब्रह्माण्ड पुराण (Brahmanda Purana)

ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं।

ब्रह्माण्डपुराण अट्ठारह महापुराणों में से एक है। मध्यकालीन भारतीय साहित्य में इस पुराण को ‘वायवीय पुराण’ या ‘वायवीय ब्रह्माण्ड’ कहा गया है।

ब्रह्माण्ड का वर्णन करने वाले वायु ने व्यास जी को दिये हुए इस बारह हजार श्लोकों के पुराण में विश्व का पौराणिक भूगोल, विश्व खगोल, अध्यात्मरामायण आदि विषय हैं।

मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक पृथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है।

कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है।

परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है।

पुराणों की संख्या कितनी है (Purano ki sankhya kitni hai) How many puranas are there

पुराणों की संख्या १८ (18) मानी गयी है |

पुराणों का मतलब क्या है ? (puranas meaning)

पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ है ।

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