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भगवान विष्णु के 24 अवतार (24 Avatars of Lord Vishnu)

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हिंदू धर्म के अनुसार विष्णु ‘परमेश्वर’ के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं।

संपूर्ण विश्व श्रीविष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण, निराकार तथा सगुण साकार सभी रूपों में व्याप्त हैं। ईश्वर के ताप के बाद जब जल की उत्पत्ति हुई तो सर्वप्रथम भगवान विष्णु का सगुण रूप प्रकट हुआ।

विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी है। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। आदित्य वर्ग के देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ हैं।

विष्णु के दो अर्थ है- पहला विश्व का अणु और दूसरा जो विश्व के कण-कण में व्याप्त है।

विष्णु का स्वरूप: क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु अपने चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए होते हैं।

उनके शंख को ‘पाञ्चजन्य’ कहा जाता है। चक्र को ‘सुदर्शन’, गदा को ‘कौमोदकी’ और मणि को ‘कौस्तुभ’ कहते हैं।

किरीट, कुण्डलों से विभूषित, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, कमल नेत्र वाले भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी के साथ निवास करते हैं।

विष्णुमंत्र: पहला मंत्र-

ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।

दूसरा मंत्र-

ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।
ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।

भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं. पुराणों में भगवान विष्णु के दो रूप बताए गए हैं।

एक रूप में तो उन्हें बहुत शांत, प्रसन्न और कोमल बताया गया है और दूसरे रूप में प्रभु को बहुत भयानक बताया गया है।

जहां श्रीहरि काल स्वरूप शेषनाग पर आरामदायक मुद्रा में बैठे हैं। लेकिन प्रभु का रूप कोई भी हो, उनका हृदय तो कोमल है और तभी तो उन्हें कमलाकांत और भक्तवत्सल कहा जाता है।

 कहा जाता है कि भगवान विष्णु का शांत चेहरा कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति को शांत रहने की प्रेरणा देता है.

ग्रंथों में यह बताया गया है कि भगवान विष्णु जी यह बताते हैं कि प्रत्येक समस्याओं का समाधान हमें शांत रहकर ही सफलतापूर्वक ढूंढना चाहिए।

भगवान विष्णु को अनेक नामों से जाना जाता है।भगवान श्रीविष्णु ही नारायण कहे जाते हैं।

वे ही श्रीहरि, गरुड़ध्वज, पीताम्बर, विष्वक्सेन, जनार्दन, उपेन्द्र, इन्द्रावरज, चक्रपाणि, चतुर्भुज, लक्ष्मीकांत, पद्मनाभ, मधुरिपु, त्रिविक्रम,शौरि, श्रीपति, पुरुषोत्तम, विश्वम्भर, कैटभजित, विधु, केशव, शालीग्राम आदि नामों से जाने जाते हैं।

भगवान विष्णु के अवतार (Avatars of Lord Vishnu)

सनातन धर्म में भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूप जब पृथ्वी पर दुष्टो का नाश करने विभिन्न युगों में आते हैं, तब उन्हें भगवान विष्णु का अवतार कहा जाता है।

अर्थात जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान शिव और भगवान विष्णु ने कई बार पृथ्वी पर अवतार लिया है।

अवतार संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ प्रायः उतरना होता है।

जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है, तब-तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए विष्णु भगवान विभिन्न युगों में (माया का आश्रय लेकर) उत्पन्न होते है।

ब्रह्माण्ड के निर्माण के दौरान और वह ब्रह्माण्ड का निर्माण होने के उपरान्त वे ब्रह्माण्ड के विघटन तक ब्रह्माण्ड का संरक्षण करते है।

भगवान् विष्णु जी के भागवत पुराण के अनुसार असंख्य अवतार  हुए है तथा विष्णु जी के दस अवतारों को ‘दशावतार’ भी कहा जाता ।

भगवान राम एवं कृष्ण, विष्णु के दशावतार में से एक है।भगवान विष्णु के अवतारों का वर्णन गरुणपुराण, अग्निपुराण और भागवत पुराण में भी उल्लिखित है।

शास्त्रों में विष्णु के 24 अवतार बताए हैं।लेकिन दशावतार को इनमें से प्रमुख माना गया है- मतस्य, कच्छप, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बु‍द्ध और कल्कि।

विष्णु जी के 23 अवतार अब तक पृथ्वी पर अवतरित हो चुके है जबकि 24 वा अवतार ‘कल्कि अवतार’ के रूप में होना बाकी है।

 24 अवतारों का क्रम निम्न है-

1श्री सनकादि मुनि  2- वराह अवतार 3- नारद अवतार 4- नर-नारायण 5- कपिल मुनि  6- दत्तात्रेय अवतार 7  यज्ञ 8 भगवान ऋषभदेव 9 आदि राजपृथृ 10.मतस्य अवतार 11 कुरमा अवतार 12. भगवान धन्वंतरी 13. मोहिनी अवतार 14 भगवान नरसिंह 15. वामन अवतार 16.हयग्रीव, 17. श्री हरि अवतार18.परशुराम, 19.व्यास, 20. हंस 21. राम अवतार 22.कृष्ण, 23.बुद्ध 24.कल्कि।

1 श्री सनकादि मुनि 

धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की।

उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया।

ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

2 वराह अवतार

धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है।

वराह अवतार भगवान विष्णु जी पृथ्वी की रक्षा हेतु लिया था।

भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया को भगवान विष्णु इस अवतार में अवतरित हुए थे। ऐसा माना जाता है इस अवतार में आने का प्रमुख कारण हिरण्क्षय के कहर से सृष्टि को बचाना था।

पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए।

भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया।

अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए।

जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया।

इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया।

3 नारद अवतार 

धर्म ग्रंथों के अनुसार देवर्षि नारद भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं।

उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है। 

श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं।

4 नर-नारायण

भगवान विष्‍णु ने 24 अवतार लिए हैं, इन्हीं 24 अवतारों में से चौथा अवतार नर-नारायण का है। सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए दो रूपों में अवतार लिया।

पुराणों के अनुसार नर-नारायण की उत्पत्ति धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से हुई थी। कहा जाता है, कि बदरीनाथ दो पहाड़ियों के बीच स्थित है।

एक पर भगवान नारायण ने तपस्या की थी जबकि दूसरे पर नर ने। नारायण ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, वहीं नर नें अर्जुन के रुप में अवतार लिया था।

नारायण का तप भंग करने के लिए इंद्र ने अपनी सबसे सुंदर अप्सरा रंभा को भेजा था।इस अवतार में इनका रूप ऋषि मुनियों के समान है।

इस अवतार में वे अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं वक्ष:स्थल में श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका संपूर्ण वेष तपस्वियों के समान था ।

5 कपिल मुनि 

भगवान विष्णु ने पांचवा अवतार कपिल मुनि के रूप में लिया। इनके पिता का नाम महर्षि कर्दम व माता का नाम देवहूति था।

शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह के शरीर त्याग के समय वेदज्ञ व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवा कपिल भी वहां उपस्थित थे।

भगवान कपिल के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं।

6 दत्तात्रेय अवतार 

धर्म ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय भी भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-

एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया।

भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची।

उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं।

तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें।तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए।

महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।

अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं।

ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं।

जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी।

तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

7  यज्ञ

भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था।

स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई।

इन्हीं आकूति के यहां भगवान विष्णु यज्ञ नाम से अवतरित हुए

भगवान यज्ञ के उनकी धर्मपत्नी दक्षिणा से अत्यंत तेजस्वी बारह पुत्र उत्पन्न हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तर में याम नामक बारह देवता कहलाए।

8 भगवान ऋषभदेव 

भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में आठवांं अवतार लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाराज नाभि की कोई संतान नहीं थी।

इस कारण उन्होंने अपनी धर्मपत्नी मेरुदेवी के साथ पुत्र की कामना से यज्ञ किया।

यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।

वरदान स्वरूप कुछ समय बाद भगवान विष्णु महाराज नाभि के यहां पुत्र रूप में जन्मे

पुत्र के अत्यंत सुंदर सुगठित शरीर, कीर्ति, तेल, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम ऋषभ रखा ।

9 आदिराज पृथु 

भगवान विष्णु के 9वे अवतार का नाम आदिराज पृथु है। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वायम्भुव मनु के वंश में अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसिक पुत्री सुनीथा के साथ हुआ।

उनके यहां वेन नामक पुत्र हुआ। उसने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा।तब महर्षियों ने मंत्र पूत कुशों से उसका वध कर दिया।

तब महर्षियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ

पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया कि पृथु के वेष में स्वयं श्रीहरि का अंश अवतरित हुआ है।

10 मत्स्य अवतार

 पुराणों और ग्रंथो में उल्लेखित कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु जी ने पूरी सृष्टि को जल मग्न होने तथा प्रलय के संकट से बचाने के लिए मत्स्य अवतार लिया था  कृतयुग में एक राजा सत्यव्रत थे।

वह राजा सत्यव्रत एक दिन किसी नदी में स्नान करके उस नदी में जलांजलि दे रहे थे। जलांजलि के दौरान अचानक से उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आ गयी।

उन्होंने यह देखकर सोचा कि वह उस मछली को वापस से सागर में डाल देंगे किन्तु उस मछली ने राजा सत्यव्रत से कहा कि आप मुझको सागर में मत डालिएगा अन्यथा मुझे बड़ी मछलियां अपना ग्रास बना लेंगी।

तब राजा सत्यव्रत ने उस मछली को अपने कमंडल में स्थान दे दिया। जब मछली और बड़ी हो गई तब राजा ने उस मछली को अपने सरोवर में स्थान दे दिया।

फिर देखते ही देखते वह मछली और अधिक बड़ी हो गई तो राजा को ज्ञात हो गया कि यह कोई साधारण मछली नहीं है। तब राजा ने उस मछली से अपने वास्तविक रूप में आने के लिए प्रार्थना की।

उस राजा की प्रार्थना सुनकर साक्षात चतुर्भुजधारी भगवान नारायण प्रकट हो गए और उस राजा से कहा कि यह मेरा मत्स्यावतार है।

श्री नारायण ने सत्यव्रत से कहा कि सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन के उपरान्त प्रलय होगी। इस प्रलय से बचने हेतु तुम एक विशाल नाव का निर्माण करो और तुम उस नाव में सप्त ऋषियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर तथा औषधियों को लेकर बैठ जाना और जब तुम्हारी यह विशाल नाव प्रलय के कारण डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में तुम्हारी सहायता करूँगा।

उस दौरान वासुकि नाग के माध्यम से नाव को मेरे सींग से बांध देना।

मैं तुम्हें उस समय के दौरान प्रश्न पूछने पर उत्तर दूंगा, जिसके कारण मेरी महिमा जो कि परब्रह्म के नाम से विख्यात है, वह तुम्हारे ह्रदय में जन्म लेगी।

अतः इस मत्स्यावतार दौरान श्री हरी विष्णु जी ने राजा सत्यव्रत को उपदेश भी दिया था जो कि मत्स्यपुराण कहलाता है।

11 कूर्म अवतार

कूर्म के अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्रमंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था।

इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदर पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एंव असुरों ने समुद्र मंथन करके चौदह रत्नोंकी प्राप्ति की।

भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया।

इंद्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इंद्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए।

समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके।

तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया।

किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा।

यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए।

भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

12 भगवान धन्वन्तरि 

धर्म ग्रंथों के अनुसार जब देवताओं व दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमें से सबसे पहले भयंकर विष निकला जिसे भगवान शिव ने पी लिया।

इसके बाद समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, देवी लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, कल्प वृक्ष, अप्सराएं और भी बहुत से रत्न निकले।

सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

यही धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अवतार माने गए हैं। इन्हें औषधियों का स्वामी भी माना गया है।

13 मोहिनी अवतार 

मोहिनी अवतार एक अति सुन्दर और मोहक स्त्री का रूप था जो भगवान विष्णु ने दैत्यों से अमृत कलश की रक्षा के लिए लिया। समुन्द्र मंथन की पौराणिक कथा में मोहिनी अवतार का वर्णन है ।

धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर निकले। जैसे ही अमृत मिला अनुशासन भंग हुआ। देवताओं ने कहा हम ले लें, दैत्यों ने कहा हम ले लें।

इसी खींचातानी में इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कुंभ लेकर भाग गया। सारे दैत्य व देवता भी उसके पीछे भागे। असुरों व देवताओं में भयंकर मार-काट मच गई।

देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। भगवान ने मोहिनी रूप में सबको मोहित कर दिया ।

मोहिनी ने देवता व असुर की बात सुनी और कहा कि यह अमृत कलश मुझे दे दीजिए तो मैं बारी-बारी से देवता व असुर को अमृत का पान करा दूंगी।

दोनों मान गए। देवता एक तरफ  तथा असुर दूसरी तरफ  बैठ गए।फिर मोहिनी रूप धरे भगवान विष्णु ने मधुर गान गाते हुए तथा नृत्य करते हुए देवता व असुरों को अमृत पान कराना प्रारंभ किया ।

वास्तविकता में मोहिनी अमृत पान तो सिर्फ देवताओं को ही करा रही थी, जबकि असुर समझ रहे थे कि वे भी अमृत पी रहे हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं का भला किया।

14 भगवान नृसिंह 

पुराणों के अनुसार दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप अहंकार के कारण खुद को ईश्वर से अधिक शक्तिशाली मानने लगा था।

उसने ब्रह्मा जी को कठोर तपस्या से प्रसन्न कर किसी भी (मनुष्य, पक्षी, पशु, और देवी -देवता, न रात में, न दिन में, न आकाश में, न धरती पर, न अस्त्र से तथा न ही शस्त्र से) ना मरने का वरदान प्राप्त कर लिया था।

और उसके राज्य में जो भी विष्णु जी की पूजा करता वह उसको दंड देता था।

उसका पुत्र प्रह्लाद भी बचपन से विष्णु जी की पूजा-अराधना करता था और विष्णु जी का परम भक्त था जब यह बात हिरण्यकश्यप को ज्ञात हुई तो वह बहुत क्रोधित हो गया और अपने पुत्र को समझाने चला गया किन्तु पुत्र प्रह्लाद ने यह बात ना मानी तो उसे भी मृत्यु दंड दे दिया।

लेकिन वह श्री हरि के चमत्कार से बच गया फिर उसने अपनी बहन होलिका जिसको आग से ना जलने का वरदान प्राप्त हुआ था उसे अपने पुत्र के साथ अग्नि में बैठने के लिए कहा होलिका पुत्र प्रह्लाद को लेकर जलती अग्नि में बैठ गयी।

परन्तु प्रह्लाद हरि की कृपा से बच गया तथा होलिका उस अग्नि में जल गई।

इसके बाद हिरण्यकश्यप स्वयं प्रह्लाद को मरने को तैयार हुआ तब विष्णु जी खम्बे में से नृसिंह अवतार में प्रकट हुए और उन्होंने प्रह्लाद की रक्षा कर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया।

15 वामन अवतार

महादानी दैत्यराज बलि से तीनो लोको को बचाने के लिए यह अवतार विष्णु जी ने लिया था। यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो बौने ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए थे।

इनको दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है।

सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए।

तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया।

 एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी।

राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प ले लिया।

भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा।

बलि के सिर पर पग रखने से वह सुतललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे सुतललोक का स्वामी भी बना दिया।

इस तरह भगवान वामन ने देवताओं की सहायता कर उन्हें स्वर्ग पुन: लौटाया। वामन अवतार में भगवान विष्णु ने बली को यह पाठ दिया था कि अहंकार से जीवन में कुछ नहीं मिलता है।

16 हयग्रीव अवतार

धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए।

वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया।

इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान था।

तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

17 श्रीहरि अवतार

धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समय में त्रिकूट नामक पर्वत की तराई में एक शक्तिशाली गजेंद्र अपनी हथिनियों के साथ रहता था।

एक बार वह अपनी हथिनियों के साथ तालाब में स्नान करने गया। वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा।

गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष एक हजार साल तक चलता रहा। अंत में गजेंद्र शिथिल पड़ गया और उसने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया।

गजेंद्र की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया।

भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया।

18 परशुराम अवतार 

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के  प्रमुख अवतारों में से एक थे। परशुराम सही मायने में महान वीर और अजेय ब्राह्मण योद्धा थे।

आमतौर भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं।

हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

 प्राचीन समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था।

वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा कि आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं, सभी ओर मेरा ही राज है।

तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला।

इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे।

इस प्रकार भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्रि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया और यह परशुराम कहलाए। परशुराम ने समस्‍य क्षत्रिय कुल का नाश कर दीया ।

19 महर्षि वेदव्यास 

पुराणों में महर्षि वेदव्यास को भी भगवान विष्णु का ही अंश माना गया है। भगवान व्यास नारायण के कलावतार थे।

वे महाज्ञानी महर्षि पराशर के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। उनका जन्म कैवर्तराज की पोष्यपुत्री सत्यवती के गर्भ से यमुना के द्वीप पर हुआ था।

उनके शरीर का रंग काला था। इसलिए उनका एक नाम कृष्णद्वैपायन भी था

इन्होंने ही मनुष्यों की आयु और शक्ति को देखते हुए वेदों के विभाग किए।

इसलिए इन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। इन्होंने ही महाभारत ग्रंथ की रचना भी की।

20 हंस अवतार 

सनकादि मुनियों का संदेह दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने यह अवतार लिया था।

एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा में बैठे थे।

तभी वहां उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे।

तभी वहां भगवान विष्णु महाहंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया।

इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की। इसके बाद महाहंसरूपधारी श्रीभगवान अदृश्य होकर अपने पवित्र धाम चले गए।

21 श्रीराम अवतार

भगवान श्रीराम विष्णु जी के 21वे अवतार है।भगवान का मनुष्य के रूप में यह अवतार मानव को समाज में अपनी मर्यादा पूर्ण जीवन जीना सिखाता है।

त्रेतायुग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे।रावण को भगवान शिव से अमृत प्राप्त था जो कि रावण ने अपनी नाभि में छुपा रखा था।

उसके वध के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और मर्यादा का पालन करते हुए अपना जीवन यापन किया।

पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास भोगते समय राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर ले गया।

सीता की खोज में भगवान लंका पहुंचे, वहां भगवान श्रीराम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मारा गया।

इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को भय मुक्त किया।

मर्यादित जीवन और आचरण से राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए।

श्री रामलला विराजमान

22 श्रीकृष्ण अवतार 

हिन्दू धर्म में श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार माने जाते हैं ।

कृष्ण जी के अवतार में उन्होंने सभी प्रकार की लीलाएं की, कृष्ण अवतार 16 कलाओं से परिपूर्ण अवतार था।

श्री कृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर युग पुरुष थे। विष्णु जी का यह अवतार लेने का मुख्य कारण कंस का वध करना था द्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। इनके पिता का नाम वासुदेव और माता का नाम देवकी था।

भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए और दुष्टों का सर्वनाश किया।कंस का वध करके भगवान श्रीकृष्ण ने वासुदेव और माता देवकी को बंधनों से मुक्त किया।

महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

श्री कृष्णा और उनकी लीलाएं

23 बुद्ध अवतार 

धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।

एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इंद्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है।

तब इंद्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी।

तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।

 इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है।

यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं।

भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण करना छोड़ दिया।

इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।

उन्होंने विश्व में शांति स्थापना के लिए यह अवतार लिया था।

गौतम बुद्ध (Goutam Buddha) और उनके उपदेश

24 कल्कि अवतार 

पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार कलयुग के अंत में में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यह अवतार अवतरित होगा ।

कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा।

यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और सभी मनुष्य को दुखों से मुक्त करके धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।

इसी के  साथ ही कलियुग की समाप्ति हो जाएगी और सतयुग दोबारा प्रारंभ होगा।