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जानिए क्या है वेद और उपनिषद

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Ved aur Upnishad
Ved aur Upnishad

धर्म और वेद

धर्म का प्राप्य: जिससे अलौकिक उन्नति तथा पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति हो वह धर्म है।

धर्म से ही लोक और समाज का निर्धारण होता है।  

हमारे सत्कर्म ही प्रारब्ध बनते हैं और वही दूसरे जन्म के ऐश्वर्य, वैभव, सुख के कारण होते हैं। इसके विपरीत अधर्म को धारण करने वाले दु:ख पीड़ा को प्राप्त होते हैं।

धर्म के आचरण से भोग वृत्ति का नाश होता है। हृदय की शुद्धि होती है। इस प्रकार कर्मों में असंगता की प्राप्ति होती है जहां कर्मों में असंगता की सिद्धि हुई, मोक्ष स्वत:सिद्ध हो जाता है।

हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही हैं।

वेदों के नियमानुसार जीवन निर्वाह ही मनुष्य का धर्म है। वेदों की उत्पत्ति सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही हुई। कहना अनुचित नहीं कि वेद धर्म का संविधान है।

 धर्म का जो नाश करेगा, धर्म उसका विनाश कर देगा और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।  एक ग्रंथ के अनुसार ब्रह्मा जी के चारों मुख से वेदों की उत्पत्ति हुई है।

 शास्त्रों को 2 भागों में बांटा गया है- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं।

वेदों का परिचय

वेद ही हिंदू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्म ग्रंथ है।भारत में वेदों का महत्वपूर्ण स्थान है।

यह प्राचीन ज्ञान के स्रोत है।ऐसा माना जाता है। कि ईश्वर ने ऋषि-मुनियों को जो ज्ञान दिया उसे वह लिपिबद्ध करते गए जो आगे चलकर वेद के रूप में जाने गए।

  • वेद दुनिया के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेद शब्द संस्कृत के “विद” शब्द से निर्मित है अर्थात इस एक मात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है। प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को जान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ “वेद” कहलाये।
  • सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है “ज्ञान”। वस्तुत: ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है। वेद पुरातन ज्ञान विज्ञान का अथाह भंडार है। इसमें मानव की हर समस्या का समाधान है।
  • वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या

ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढने के लिए सुविधानुसार चार भागो में विभग्त कर दिया गया।

वेद में एक ही ईश्वर की उपासना का विधान है और एक ही धर्म – ‘मानव धर्म’ का सन्देश है ।

वेद मनुष्यों को मानवता, समानता, मित्रता, उदारता, प्रेम, परस्पर-सौहार्द, अहिंसा, सत्य, संतोष, अस्तेय(चोरी ना करना), अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, आचार-विचार-व्यवहार में पवित्रता, खान-पान में शुद्धता और जीवन में तप-त्याग-परिश्रम की व्यापकता का उपदेश देता है

वेद’ मनुष्यों का शाश्वत यक्षु है – जो शुभ और अशुभ का ज्ञान कराता है ।

वेद संसार के सभी रहस्यों की कुंजी है ।

वेद 4 हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद विश्व के प्रथम प्रमाणिक ग्रन्थ है।

वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। गुरु द्वारा शिष्यों को मौखिक रूप से कंठस्त कराने के कारण वेदों को “श्रुति” की संज्ञा दी गई है।

वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है।

  • यह चार वेद सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा को उनकी आत्माओं में प्रेरणा द्वारा प्रदान किये थे।
  • प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है। इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है। जो अज्ञान का अँधेरा है। इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक बन गया है। वायु प्राय: चलायमान है, उसका काम चलना (बहना) है। इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना। इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है। सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं, नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं। इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है।
  • वेद सबसे प्राचीनतम पुस्तक हैं इसलिए किसी व्यक्ति या स्थान का नाम वेदों पर से रखा जाना स्वाभाविक है। जैसे आज भी रामायण, महाभारत इत्यादि में आए शब्दों से मनुष्यों और स्थान आदि का नामकरण किया जाता है। 

वेदों का इतिहास

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के ‘भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में रखी हुई हैं।

इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है।

उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।

वेदों के उपवेद

ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है।

इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

1. ऋग्वेद

 ऋक अर्थात स्थिति और ज्ञान। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है।

ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।

इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।

 ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है।

इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। इस वेद की 5 शाखाएं हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है।

ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना में औषधियों की संख्या 125 के दो लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है।

औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है।

2. यजुर्वेद  

यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म।

श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा।  यजु अर्थात गतिशील आकाश एवं कर्म। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं।

यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्वज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रम्हांड, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। इस वेद की 2 शाखाएं हैं- शुक्ल और कृष्ण।

  • कृष्ण :वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।
  • शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।

3. सामवेद

साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है।

सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। 

इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं।

इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं।

सामवेद की रचना ऋग्वेद में दिए गए मंत्रों को गाने योग्य बनाने हेतु की गयी थी।

इसमेें 1810 छंद हैं

सामवेद तीन शाखाओं में विभक्त है- कौथुम, राणायनीय और जैमनीय।

सामवेद को भारत की प्रथम संगीतात्मक पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।

सामवेद गीत-संगीत प्रधान है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था।

सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है   इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, सामवेद यद्यपि छोटा है परन्तु एक तरह से यह सभी वेदों का सार रूप है और सभी वेदों के चुने हुए अंश इसमें शामिल किये गये है।

सामवेद संहिता में जो सामवेद संहिता के दो भाग हैं, आर्चिक और गान। पुराणों में जो विवरण मिलता है उससे सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं के होने की जानकारी मिलती है।

वर्तमान में प्रपंच ह्रदय, दिव्यावदान, चरणव्युह तथा जैमिनि गृहसूत्र को देखने पर १३ शाखाओं का पता चलता है।

इसमें भक्तिमय व शांतिदायक प्रार्थनाएं हैं, जो मानसिक और आध्यात्मिक विकास में बड़ी सहायक हैं । ।

4. अथर्वदेव

थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है।

इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्देद आदि का जिक्र है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है। इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते है।

अथर्ववेद संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम वेदों में से चौथे वेद अथर्ववेद की संहिता अर्थात मन्त्र भाग है। इस वेद को ब्रह्मवेद भी कहते हैं।

इसमें देवताओं की स्तुति के साथ, चिकित्सा, विज्ञान और दर्शन के भी मन्त्र हैं।

अथर्ववेद संहिता के बारे में कहा गया है कि जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान् शान्तिस्थापन के कर्म में निरत रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवरहित होकर निरन्तर उन्नति करता जाता हैःअथर्ववेद का ज्ञान भगवान ने सबसे पहले महर्षि अंगिरा को दिया था, फिर महर्षि अंगिरा ने वह ज्ञान ब्रह्मा को दिया |

 । वेदों को ईश्वरीय ज्ञान न माननेवालों ने भी यही निष्कर्ष निकाला है कि मूल ज्ञान का स्त्रोत परमेश्वर ही है । वह ज्ञान वेदों में ही है, अन्य कहीं नहीं । यह वेद सबसे बड़ा है,

उपनिषद

उपनिषद् का साधारण अर्थ है – ‘समीप उपवेशन’ या ‘समीप बैठना (ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए शिष्य का गुरु के पास बैठना)। है किसके समीप बैठना ,जो शिक्षा दे सके।

हमें असत से सत की ओर ले चले ,अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चले। उपनिषद् शब्द का यह शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से उत्पन्न हुआ है।

 उपनिषद में ‘सद’ धातु के तीन अर्थ हैं – विनाश, गति, अर्थात ज्ञान -प्राप्ति और शिथिल करना।

इस प्रकार उपनिषद का अर्थ हुआ-‘जो ज्ञान पाप का नाश करे, सच्चा ज्ञान प्राप्त कराये, आत्मा के रहस्य को समझाये तथा अज्ञान को शिथिल करे, वह उपनिषद है।

जिस विद्या से परब्रह्म, अर्थात ईश्वर का सामीप्य प्राप्त हो, उसके साथ तादात्म्य स्थापित हो,वह विद्या ‘उपनिषद’ कहलाती है।

उपनिषद् में ऋषि और शिष्य के बीच बहुत सुन्दर और गूढ संवाद है जो पाठक को वेद के मर्म तक पहुंचाता है।

विद्वानों ने ‘उपनिषद’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘उप’+’नि’+’सद’ के रूप में मानी है।

इनका अर्थ यही है कि जो ज्ञान व्यवधान-रहित होकर निकट आये, जो ज्ञान विशिष्ट और सम्पूर्ण हो तथा जो ज्ञान सच्चा हो, वह निश्चित रूप से उपनिषद ज्ञान कहलाता है।

मूल भाव यही है कि जिस ज्ञान के द्वारा ‘ब्रह्म’ से साक्षात्कार किया जा सके, वही ‘उपनिषद’ है। इसे अध्यात्म-विद्या भी कहा जाता है।

उपनिषद् परिचय

उपनिषदों ने मानव समाज को परमार्थिक ज्ञान दिया। ईश्वर का मानव और जगत के साथ क्या सम्बन्ध है ,किस रूप में है ,इसे जानने के क्या उपाय हैं जैसे अनेक प्रश्नों का समाधान उपनिषद् से ज्ञात होता है।

उपनिषद कहते हैं कि एक उच्चतर शक्ति है जो हमें आध्यात्मिक सत्ता को ग्रहण करने के योग्य बनाती है।

 उपनिषद् (Upnishads) वैदिक वांग्मय के अभिन्न भाग हैं। इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है।

उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्त्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य या जैन धर्म या बौद्ध धर्म । उपनिषदों को स्वयं भी वेदान्त कहा गया है।जिसका अर्थ है वेदों का अंतिम भाग ।

दुनिया के कई दार्शनिक उपनिषदों को सबसे बेहतरीन ज्ञानकोश मानते हैं। उपनिषद् भारतीय सभ्यता की विश्व को अमूल्य धरोहर है। ये संस्कृत में लिखे गये हैं।  चूंकि ये वेदों के अंतिम भाग हैं इसीलिए इन्हे वेदों का सार भी कहा जा सकता है। 

आत्मज्ञान, योग, ध्यान, दर्शन आदि वेदों में निहित सिद्धांत तथा उन पर किये गये शास्त्रार्थ (सही रूप से समझने या समझाने के लिये प्रश्न एवं तर्क करना) के संग्रह को उपनिषद कहा जाता है।

भारतीय-संस्कृति की प्राचीनतम एवं अनुपम धरोहर के रूप में वेदों का नाम आता है। मनीषियों ने ‘वेद’ को ईश्वरीय ‘बोध’ अथवा ‘ज्ञान’ के रूप में पहचाना है। विद्वानों ने उपनिषदों को वेदों का अन्तिम भाष्य माना है उपनिषद ब्रह्मज्ञान के ग्रन्थ हैं।

वेद का वह भाग जिसमें विशुद्ध रीति से आध्यात्मिक चिन्तन को ही प्रधानता दी गयी है और फल सम्बन्धी कर्मों के दृढानुराग को शिथिल करना सुझाया गया है, ‘उपनिषद’ कहलाता है। मुख्य उपनिषद 12 या 13 हैं। सभी किसी न किसी वेद से जुड़े हुए है ।

उपनिषद् अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्मविद्या को कहते हैं। उपनिषद् वेद का ज्ञान काण्ड है।

यह चिर प्रदीप्त वह ज्ञान दीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाश देता चला आ रहा है और जो शाश्वत है, सनातन है, अक्षर है। इसके प्रकाश में वह अमरत्व है, जिसने सनातन धर्म के मूल का सिंचन किया है। यह जगत् कल्याणकारी भारत की अपनी निधि है।

उप-समीप, निषद्-निषीदति-बैठनेवाला। जो उस परम तत्त्व के समीप पहुँचकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद् है। परम तत्त्व अवर्णनीय है।

उपनिषद् हमें उस अवर्णनीय परम तत्त्व-परब्रह्म-का साक्षात् साक्षात्कार कराते है उपनिषद् परम तत्त्व तक पहुँचने की कुंजी हैं।

अष्टाध्यायी में उपनिषद शब्द को परोक्ष या रहस्य के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है।उपनिषदों में ज्ञान काण्ड की प्रधानता है इसलिए इनमें ब्रह्म के स्वरूप, जीव एवं ब्रह्म के आपसी संबंध और ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग आदि से संबंधित ज्ञान का विस्तृत वर्णन है।

इसके अतिरिक्त इसमें वेदों के गूढ़ रहस्य भी निहित है। उपनिषद् शब्द की उत्पत्ति ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्ग और ‘षद्’ धातु के मिलने से हुई है। स्पष्ट अर्थ में ‘‘वह ज्ञान जो परब्रह्म को प्राप्त करने का मार्ग दिखाए वह उपनिषद् है

 वेद ईश्वरीय विज्ञान है। उपनिष्द का मुख्य अर्थ ब्रह्मविध्या है। इन में अधिकतर वेदों में बताये गये आध्यात्मिक विचारों को समझाया गया है। वेदों के संकलन के पश्चात कई ऋषियों ने अपनी अनुभूतियों से वैदिक ज्ञान कोष में वृद्धि की।

उन्हों ने संकलित ज्ञान की व्याख्या, आलोचना, तथा उस में संशोधन भी किया। इस प्रकार का ज्ञान आज उपनिष्दों तथा दर्शन शास्त्रों के रूप में संकलित है।

इस प्रकार का ज्ञान भारत से बाहर अन्य किसी धर्म की पुस्तक में नहीं है। प्रत्येक उपनिष्द किसी ना किसी वेद से जुडा हुआ है। उपनिष्दों के लेखन की शैली प्रश्नोत्तर की है।

उपनिषदों के प्रकार

मुख्य उपनिषद् दस कहे गए हैं।

ये है-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, एतरेय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक।

उपनिषद संख्या में 108 हैं, इन्हें आरण्यक ग्रन्थ कहा गया है, अरण्य अर्थात वन, इनमें प्राचीन भारत में गुरुकुलों या गुरुओं के आश्रमों में आत्मा, परमात्मा और सृष्टि आदि के सम्बन्ध में गुढ रहस्य है, जो गुरु शिष्य संवाद की शैली में है, शिष्य प्रश्न पुछता है और गुरु उसका उत्तर देता जाता है, बहुत ही अनुठे और रहस्यों से भरे हैं उपनिषद।

सम्पूर्ण वेद तीन भागों में विभक्त हैं-उपनिषद् भाग, मंत्र भाग और ब्राह्मण भाग। उपनिषद् भाग वेद के ज्ञान काण्ड का प्रकाशक है। वर्तमान मन्वंतर में वेद की 1180 शाखाएँ आविर्भूत हुईं। इतनी ही संख्या में उपनिषद्, ब्राह्मण और मंत्र भाग भी प्रकट हुए।

उपनिषदों का महत्व

 उपनिषद् हिन्दू धर्म के महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ हैं। ये वैदिक वाङ्मय के अभिन्न भाग हैं। ये संस्कृत में लिखे गये हैं। इनकी संख्या लगभग २०० है, किन्तु मुख्य उपनिषद १३ हैं। हर एक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है।

इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है।

उपनिषदों में कर्मकाण्ड को ‘अवर’ कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया कि ज्ञान स्थूल सूक्ष्म (मन और आत्मा) की ओर ले जाता है। ब्रह्म, जीव और जगत्‌ का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है।

भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों के साथ मिलकर वेदान्त की ‘प्रस्थानत्रयी’ कहलाते हैं। ब्रह्मसूत्र और गीता कुछ सीमा तक उपनिषदों पर आधारित हैं। भारत की समग्र दार्शनिक चिन्तनधारा का मूल स्रोत उपनिषद-साहित्य ही है।

इनसे दर्शन की जो विभिन्न धाराएं निकली हैं, उनमें ‘वेदान्त दर्शन’ का अद्वैत सम्प्रदाय प्रमुख है। उपनिषदों के तत्त्वज्ञान और कर्तव्यशास्त्र का प्रभाव भारतीय दर्शन के अतिरिक्त धर्म और संस्कृति पर भी परिलक्षित होता है।

उपनिषदों का महत्त्व उनकी रोचक प्रतिपादन शैली के कारण भी है। कर्इ सुन्दर आख्यान और रूपक, उपनिषदों में मिलते हैं।

कुछ सीमा तक उपनिषदों पर आधारित हैं। भारत की समग्र उपनिषद् भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर है। उपनिषद ही समस्त भारतीय दर्शनों के मूल स्रोत हैं, चाहे वो वेदान्त हो या सांख्य।

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं। वे चिन्तनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं।

वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएं हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में प्रस्तुत करनेकि की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अन्तरदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

उपनिषदों में मुख्य रूप से ‘आत्मविद्या’ का प्रतिपादन है, जिसके अन्तर्गत ब्रह्म और आत्मा के स्वरूप, उसकी प्राप्ति के साधन और आवश्यकता की समीक्षा की गयी है।

आत्मज्ञानी के स्वरूप, मोक्ष के स्वरूप आदि अवान्तर विषयों के साथ ही विद्या, अविद्या, श्रेयस, प्रेयस, आचार्य आदि तत्सम्बद्ध विषयों पर भी भरपूर चिन्तन उपनिषदों में उपलब्ध होता है।

वैदिक ग्रन्थों में जो दार्शनिक और आध्यात्मिक चिन्तन यत्र-तत्र दिखार्इ देता है, वही परिपक्व रूप में उपनिषदों में निबद्ध हुआ है।

उपनिषद् ब्रह्मविद्या का द्योतक है। कहते हैं इस विद्या के अभ्यास से मुमुक्षुजन की अविद्या नष्ट हो जाती है (विवरण); वह ब्रह्म की प्राप्ति करा देती है (गति); जिससे मनुष्यों के गर्भवास आदि सांसारिक दुःख सर्वथा शिथिल हो जाते हैं (अवसादन)। फलतः उपनिषद् वे ‘तत्त्व’ प्रतिपादक ग्रन्थ माने जाते हैं जिनके अभ्यास से मनुष्य को ब्रह्म अथवा परमात्मा का साक्षात्कार होता है।

उपनिषदों का उद्देश्य

भारतीय दर्शन की लगभग सभी धाराएँ उपनिषदों में मिलती हैं। लेकिन यदि उपनिषदों के उद्देश्य की बात की जाए तो वे मनुष्यों को सत्य ज्ञान का दर्शन कराते हैं।

मनुष्यों के मन में उठने वाले प्रश्नों-ब्रह्म कौन है ? हम कौन हैं ? जन्म-मृत्यु का चक्र क्या है ? समस्त चराचर जगत् का स्वामी कौन है ? इनका संचालन कौन करता है ? मोक्ष क्या है ? आदि-आदि सभी जिज्ञासाओं का समाधान ये उपनिषद् करते हैं।

अतः कहा जा सकता है कि उपनिषद् ज्ञान के भण्डार हैं और ये ब्रह्म से साक्षात्कार के माध्यम हैं।

उपनिषदों में लिखित कथाएं

उपनिषदों में देवता-दानव, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, पृथ्वी, प्रकृति, चर-अचर, सभी को माध्यम बना कर रोचक और प्रेरणादायक कथाओं की रचना की गयी है।

इन कथाओं की रचना वेदों की व्याख्या के उद्देश्य से की गई। जो बातें वेदों में जटिलता से कही गयी है उन्हें उपनिषदों में सरल ढंग से समझाया गया है।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अग्नि, सूर्य, इन्द्र आदि देवताओं से लेकर नदी, समुद्र, पर्वत, वृक्ष तक उपनिषद के कथापात्र है।

उपनिषद् गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श उदाहरण हैं। प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन उपनिषदों में सहज ढंग से किया गया है।

विभिन्न दृष्टान्तों, उदाहरणों, रूपकों, संकेतों और युक्तियों द्वारा आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि का स्पष्टीकरण इतनी सफलता से उपनिषद् ही कर सके हैं।

उपनिषदों का स्वरूप     

उपनिषद अध्यात्मविद्या के विविध अध्याय हैं जो विभिन्न अंत:प्रेरित ऋषियों द्वारा लिखे गए हैं।

इनमें विश्व की परमसत्ता के स्वरूप, उसके अवस्थान, विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के साथ उसके संबंध, मानवीय आत्मा में उसकी एक किरण की झलक या सूक्ष्म प्रतिबिंब की उपस्थिति आदि को विभिन्न रूपकों और प्रतीकों के रूप में वर्णित किया गया है।

सृष्टि के उद्‍गम एवं उसकी रचना के संबंध में गहन चिंतन तथा स्वयंफूर्त कल्पना से उपजे रूपांकन को विविध बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है।

अंत में कहा यह गया कि हमारी श्रेष्ठ परिकल्पना के आधार पर जो कुछ हम समझ सके, वह यह है। इसके आगे इस रहस्य को शायद परमात्मा ही जानता हो और ‘शायद वह भी नहीं जानता हो।’

उपनिषदों में आत्मज्ञान के संदर्भ में मनुष्य की चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है-पहली जागृत अवस्था-यह वह अवस्था है जिसमें मनुष्य शारीरिक उपभोग, हर्ष, क्रोध, सुख, दुःख आदि विभिन्न कर्म आदि करता है। यह बहिर्मुखी अवस्था है।

दूसरी अवस्था-यह अवस्था स्वप्नावस्था है जिसमें मनुष्य लालसा आदि में लिप्त रहता है। यह अंतर्मुख अवस्था है।

तीसरी अवस्था-यह वह अवस्था है जिसमें वह सुषुप्तावस्था में रहता है। इसमें वह न तो कोई स्वप्न देखता है; न कोई कामना करता है न कोई कार्य। अर्थात् वह सदा आनन्दित रहता है।

चौथी अवस्था-यह अवस्था तुरीयावस्था है जिसमें मनुष्य के सारे कार्य शांत हो जाते हैं और वह शांति प्राप्त करता है।

उसके सारे द्वैत समाप्त हो जाते हैं और वह अद्वैत को प्राप्त करता है और यह अद्वैतवाद समस्त प्राणियों में केवल और केवल एक आत्मतत्त्व के दर्शन करवाता है।

उपनिषद् हमें अंतर्मुख साधना, जोकि ब्रह्मविद्या है उसे किस प्रकार साधा जाए, वह सिखाते हैं। ब्रह्मविद्या में परब्रह्म ही है जोकि इस सृष्टि का कारण है और वही सबका प्रकाशक है। वही जीवों की आत्मा है, वही मोक्षदाता है।

उपनिषदों में मानव-शरीर का वर्णन करते हुए बताया गया है कि मानव-शरीर पाँच कोशों के आवरण से ढका है और व्यक्ति तभी मोक्ष प्राप्त कर सकता है जब वह इन आवरणों को भेदे।

 उपनिषदों में उन अनेक प्रयत्नों का विवरण है जो इन प्राकृतिक शक्तियों के पीछे की परमशक्ति या सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता से साक्षात्कार करने की मनोकामना के साथ किए गए।

मानवीय कल्पना, चिंतन-क्षमता, अंतर्दृष्टि की क्षमता जहाँ तक उस समय के दार्शनिकों, मनीषियों या ऋषियों को पहुँचा सकीं उन्होंने पहुँचने का भरसक प्रयत्न किया। यही उनका तप था।

आध्यात्मिक चिंतन की अमूल्य निधि

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन के मूल आधार हैं, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के स्रोत हैं। वे ब्रह्मविद्या हैं। जिज्ञासाओं के ऋषियों द्वारा खोजे हुए उत्तर हैं।

वे चिंतनशील ऋषियों की ज्ञानचर्चाओं का सार हैं। वे कवि-हृदय ऋषियों की काव्यमय आध्यात्मिक रचनाएं हैं, अज्ञात की खोज के प्रयास हैं, वर्णनातीत परमशक्ति को शब्दों में बांधने की कोशिशें हैं और उस निराकार, निर्विकार, असीम, अपार को अंतरदृष्टि से समझने और परिभाषित करने की अदम्य आकांक्षा के लेखबद्ध विवरण हैं।

 कौटिल्य के अर्थशास्त्र में युद्ध के गुप्त संकेतों की चर्चा में ‘औपनिषद’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि उपनिषद का तात्पर्य रहस्यमय ज्ञान से है।

 अमरकोष उपनिषद के विषय में कहा गया है-उपनिषद शब्द धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए प्रयुक्त होता है।