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पितर पक्ष और श्राद्ध का महत्व

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पितर पक्ष और श्राद्ध का महत्व
पितर पक्ष और श्राद्ध का महत्व

हिन्दू धर्म

हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म) एक धर्म (या, जीवन पद्धति) है जिसके अनुयायी अधिकांशतः भारत ,नेपाल और मॉरिशस में बहुत ज्यादा संख्या में हैं।

इसे विश्व का प्राचीनतम धर्म कहा जाता है।

इसे ‘वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म’ भी कहते हैं सनातन का अर्थ है अनंत धर्म या अनंत सत्य।

दूसरे धर्मों की तरह हिंदू धर्म का कोई संस्थापक नहीं है। यह भारत का राज्य धर्म है और आज से लगभग 1500 से 2000 ईशा पूर्व में यह चलन में आया है जिसकाअर्थ है यह है कि  हिंदू धर्म की उत्पत्ति मानव की उत्पत्ति से भी पहले हुई  है।

हिंदू धर्म को दुनिया का तीसरा बड़ा धर्म माना जाता है।

हिंदू धर्म में बहुत परंपराओं को मान्यता दी जाती है जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों को मालूम है। तो चलिए जानते हैं हिंदू धर्म के बारे में कुछ रोचक जानकारी।

1. कुछ लोग हिंदू धर्म को वैदिक धर्म के नाम से भी जानते हैं।

2. हिंदू धर्म में एक ही ईश्वर को सर्वोपरि माना जाता है जिनकी अनेक रूपों में पूजा की  जाती है

 जिसमें राम, कृष्णा, देवी, सरस्वती, लक्ष्मी आदि शामिल है।

3. क्या आप लोगों को पता है हिंदू धर्म में मूर्ति की ही नहीं बल्कि  पेड़ पौधे जैसे तुलसी, पीपल,और पत्थर के अलावा लोग गाय की भी पूजा करते हैं ।

.4. हिन्दू धर्म को बहुत लचीला धर्म माना जाता हैं। यह सभी तरह के बदलाव को आसानी से समाहित कर लेता है। हिन्दू धर्म में एक ही ईश्वर है, मगर लोग उनके अलग अलग तरीके से पूजा करते हैं।

5. हिंदू धर्म में जातिवाद की कोई अवधारणा ही नहीं है यह तो लोगों द्वारा बनाया गया है जो धर्म को जाति के आधार पर बांटना चाहते हैं।

हिंदू धर्म में श्राद्ध

हिन्दू धर्म में सालभर में कई त्यौहार मनाए जाते हैं। हिन्दू धर्म के प्रमुख त्यौहारों में श्राद्ध भी शामिल है।

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है।

इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं।

जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।

भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण।

इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका

विकास करने में सहयोग दिया।

पूर्वज पूजा की प्रथा विश्व के अन्य देशों की भाँति बहुत प्राचीन है। यह प्रथा यहाँ वैदिक काल से प्रचलित रही

पितृपक्ष में हिन्दू लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं।

पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता ह      

धार्मिक मान्यता है की पूर्वजोंके खुश होने पर ही देवी-देवता खुश होते हैं।

इस कारण से पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों की मुत्यु तिथि के अनुसार, उनका श्राद्ध करते है। हिंदू धर्म में मान्यता है की जिन प्राणियों की मृत्यु के बाद उनका विधिनुसार श्राद्ध नहीं किया जाता है।

उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। और उसके पितृ उससे नाराज हो जाते हैं। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान पितृ तर्पण जरूर करना चाहिए।

पितरों को भी देवताओ के समान माना गया है। इसलिए किसी जातक की मृत्यु के बाद भी उनको उतना ही सम्मान मिलता है जितना भगवान को मिलता है।

पितृपक्ष में हिन्दू लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है,

श्राद्ध किसे कहते हैं?

श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को किया गया दान वे उन को प्रसन्न करने से है।

पितरों के प्रति तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन व दान इत्यादि ही श्राद्ध कहा जाता है।

देव, ऋषि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म सबसे आसान उपाय है।

अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना करने को ही श्राद्ध कर्म कहते हैं।

ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।

पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं।

16 दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं।

पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।जो श्रद्धा से किया जाए वह श्राद्ध है

अर्थात अपने पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति हेतु श्रद्धा पूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध कहलाता है

जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।

हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है।

ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं।

इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। 

जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।

शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म ऋण चुकाने का  सरल व सहज मार्ग है ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगणवर्ष भर प्रसन्न रहते हैं

श्राद्ध कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे संबंधियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंत सभी प्राणियों में जगत को तृप्त करता है।पितरों की पूजा को साक्षात विष्णु  पूजा ही माना गया है।

छोटे से पिंड के दान से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है इस शंका का स्कंदपुराण में बहुत सुंदर समाधान मिलता है।

एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा

मनुष्य द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल,पिंड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरूप होकर पितरों के पास पहुंचती है।

इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। देवता और पितृ गन्ध व रस तत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्वों से रहते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं इस प्रकार परिजनों द्वारा किए श्राद से पितरों प्राप्त होते हैं।

मान्यता है कि पितृपक्ष में 16 दिनों की अवधि के दौरान सभी पूर्वज अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं|

उन्हें प्रसन्न करने के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंड दान किया जाता है.सबसे पहले भोजन की तीन आहुति कंडा जलाकर दी जाती है|

श्राद्ध कर्म में भोजन के पूर्व पांच जगह पर अलग अलग भोजन का थोड़ा- थोड़ा अंश निकाला जाता है. गाय,कुत्ता,चींटी और देवताओं के लिए पत्ते पर तथा कौवे के लिए भूमि पर अंश रखा जाता है फिर प्रार्थना की जाती है कि इनकेमाध्यमसे हमारे पितर प्रसन्न हों.इन पांच अंशों का अर्पण करने को पञ्च बलि कहा जाता है.

यह माना जाता है कि जो लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान नहीं करते हैं उन्हें पितृ ऋण और पितृदोष लगता|

इन पांच जीवों का ही चुनाव क्यूँ किया गया है ?

कुत्ता जल तत्त्व का प्रतीक है ,चींटी अग्नि तत्व का ,कौवा वायु तत्व का, गाय पृथ्वी तत्त्व का और देवता आकाश तत्व का प्रतीक हैं|

इस प्रकार इन पाँचों को आहार देकर हम पञ्च तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं|

केवल गाय में ही एक साथ पांच तत्व पाए जाते हैं. इसलिए पितृपक्ष में गाय की सेवा विशेष फलदायी होती है|

मात्र गाय को चारा खिलने और सेवा करने से पितरों को तृप्ति मिलती है साथ ही श्राद्ध कर्म सम्पूर्ण होता है.  किस प्रकार केवल गाय की सेवा करके हमें पितरों का आशीर्वाद मिल सकता है ?

पितृपक्ष में गाय की सेवा से पितरों को मुक्ति मोक्ष मिलता है| साथ ही अगर गाय को चारा खिलाया जाय तो वह ब्राह्मण भोज के बराबर होता है.|

पितृपक्ष में अगर पञ्च गव्य का प्रयोग किया जाय तो पितृ दोष से मुक्ति मिल सकती है| साथ ही गौदान करने से हर तरह के ऋण और कर्म से मुक्ति मिलती है।

 ये पितृ पशु पक्षियों के माध्यम से हमारे निकट आते हैं| जिन जीवों तथा पशु पक्षियों के माध्यम से पितृ आहार ग्रहण करते हैं वे हैं –

श्राद्ध में पितरों को भोजन कराने की परंपरा है। यह परंपरा महाभारत काल से चली आ रही है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी ? सबसे पहले किसने श्राद्ध कर्म किया था ?

जानिए महाभारत काल में किसने सबसे पहले श्राद्ध किया था ?

पौराणिक मान्यताओं के आधार पर श्राद्ध

हिंदू धर्म में सनातन काल से ही पूर्वजों को पूज्यनीय माना गया है. वैदिक समय में पितृयज्ञ का वर्णन मिलता है. जो बाद में श्राद्ध कहा जाने लगा|

पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म के विधान में कोई परिवर्तन नहीं आया|

आदिकाल से चले आ रहे नियमों का आज भी पालन किया जाता है. श्राद्ध का वर्णन महाभारत काल में मिलता है.

भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था महत्व

मान्यता है कि महाभारत काल में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को विस्तार से श्राद्ध कर्म के बारे में बताया था|

पौराणिक मान्यताओं के आधार पर श्राद्ध का प्रथम उपदेश महर्षि निमि ने अत्रि मुनि को दिया था

निमि महर्षि को श्राद्ध कर्म का विधान बनाने वाला माना जाता है|

इसके बाद प्रमुख कर्मों में सम्मिलित किया गया|

कहते हैं कि महाभारत के विनाशकारी युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने कौरव और पांडवों की ओर से सभी वीरगति को प्राप्त सैनिकों का अंतिम संस्कार और श्राद्ध किया था ।पितृ पक्ष (पिता पक्ष) को “गरुए (भारी) दिन” से भी सम्बोधित किया जाता है।

पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है।

एवं हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है एवं भरत जी के द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है।.

श्राद्ध पर्व पर यह कथा अधिकांश क्षेत्रों में सुनाई जाती है। कथा के अनुसार, महाभारत के दौरान, कर्ण की मृत्यु हो जाने के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुंची तो उन्हें बहुत सारा सोना और गहने दिए गए।

कर्ण की आत्मा को कुछ समझ नहीं आया, वह तो आहार तलाश रहे थे।

उन्होंने देवता इंद्र से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना क्यों दिया गया।

तब देवता इंद्र ने कर्ण को बताया कि उसने अपने जीवित रहते हुए पूरा जीवन सोना दान किया लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भी खाना दान नहीं किया।

कर्ण ने इंद्र से कहा उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि उनके पूर्वज कौन थे और इसी वजह से वह कभी उन्हें कुछ दान नहीं कर सकें।

इस सबके बाद कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया गया और 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया।

तर्पण किया, इन्हीं 16 दिन की अवधि को पितृ पक्ष कहा गया।

दूसरी मान्यता यह भी है कि पितृपक्ष के दौरान जब भोजन न पचने की समस्या को लेकर पितृ और देवतागण ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें सारी बातें बताई।

तब जाकर ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा कि इस समस्या का समाधान अग्निदेव करेंगे।

तत्पश्चात पितृ और देवता अग्निदेव के पास पहुंचें। देवताओं और पितरों ने अग्निदेव को इस बारे में बताया। तब जाकर अग्निदेव ने उनकी इस समस्या का समाधान किया।

अग्निदेव ने देवताओं और पितरों से यह कहा कि अब से मैं भी तुम्हारे साथ भोजन करूंगा।

सभी से अग्निदेव से कहा कि मेरे नजदीक रहने से तुम्हारा भोजन भी पच जाएगा। अग्निदेव की यह बात सुनकर सभी देवता और पितृ मुस्कुराने लगे।

इसके बाद से ही श्राद्ध का सबसे पहले भोजन अग्निदेव को अर्पित किया जाने लगा। तत्पश्चात भोजन देवताओं और पितरों को प्रदान किया जाता है। श्राद्ध के दौरान ही कई लोग पिंडदान भी करते हैं

तर्पण तथा पिंडदान केवल पिता के लिए ही नहीं बल्कि समस्त पूर्वजों एवं मृत परिजनों के लिए भी किया जाता है। समस्त कुल, परिवार तथा ऐसे लोगों को भी जल दिया जाता है, जिन्हे जल देने वाला कोई न हो।

कौआ होता है यमराज का वाहक

आपको बता दे की यमराज का वाहक होने के साथ साथ जयंत कौए रूपी पक्षी ने सीता माँ पर वार कर

तब श्री राम ने ब्रह्मास्त्र चलाकर आँख फोड़ दी उसके बाद जयंत ने क्षमा मनाई तो को वरदान दिया था की तुम्हे जो भी खाना अर्पित होगा वो पितरो को मिलेगा।

और ऐसा करने से पितरों और पूर्वजों को तृप्ति मिलती है।

पितृपक्ष के दौरान जो कार्य नहीं करने चाहिए

 पितृपक्ष में जो पुरुष अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म करते हैं, उन्हें दाढ़ी और बाल नहीं कटवाना चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान दाढ़ी और बाल कटवाने से धन की हानि होती है। क्योंकि यह शोक का समय होता है

श्राद्ध कर्म के दौरान भूलकर भी लोहे के बर्तनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष में लोहे के बर्तन के प्रयोग करने से परिवार पर अशुभ प्रभाव पड़ता है।

इसलिए पितृपक्ष में लोहे के अलावा तांबा, पीतल या अन्य धातु से बनें बर्तनों का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

 श्राद्ध कर्म कर रहे हैं तो उस दिन शरीर पर तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए और ना ही पान खाना चाहिए।

इसके साथ ही दूसरे के घर का खाना पितृपक्ष में वर्जित बताया है और इत्र का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए। होता है।

इसलिए इस दौरान परिवार में एकतरह से शोकाकुल माहौल रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए, साथ ही नई वस्तु की खरीदारी करना भी अशुभ माना गया है।

पितृपक्ष के दौरान भिखारी या फिर किसी अन्य व्यक्ति को बिना भोजन कराएं नहीं जाने देना चाहिए।

इसके साथ ही पशु-पक्षी जैसे कुत्ते, बिल्ली, कौवा आदि का अपमान नहीं करना चाहिए। मान्यता के अनुसरा, पूर्वज इस दौरान किसी भी रूप में आपके घर पधार सकते हैं।

श्राद्ध इन्हें करना चाहिए

श्राद्ध का अधिकार उसके बड़े पुत्र को है लेकिन यदि जिसके पुत्र न हो तो उसके सगे भाई या पौत्र, प्रपौत्र या विधवा पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है

माननीय स्थान गया

गया में श्राद्ध करने का विशेष महत्व है।

जब बात आती है श्राद्ध कर्म की तो बिहार स्थित गया का नाम बड़ी प्रमुखता व आदर से लिया जाता है।

गया समूचे भारत वर्ष में हीं नहीं सम्पूर्ण विश्व में दो स्थान श्राद्ध तर्पण हेतु बहुत प्रसिद्द है।

वह दो स्थान है बोध गया और विष्णुपद मन्दिर | विष्णुपद मंदिर वह स्थान जहां माना जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु के चरण उपस्थित है, जिसकी पूजा करने के लिए लोग देश के कोने-कोने से आते हैं।

गया में जो दूसरा सबसे प्रमुख स्थान है जिसके लिए लोग दूर दूर से आते है वह स्थान एक नदी है, उसका नाम “फल्गु नदी” है। ऐसा माना जाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने स्वयं इस स्थान पर अपने पिता राजा दशरथ का पिंड दान किया था।

तब से यह माना जाने लगा की इस स्थान पर आकर कोई भी व्यक्ति अपने पितरो के निमित्त पिंड दान करेगा तो उसके पितृ उससे तृप्त रहेंगे और वह व्यक्ति अपने पितृऋण से उरिण हो जायेगा |

इस स्थान का नाम ‘गया’ इसलिए रखा गया क्योंकि भगवान विष्णु ने यहीं के धरती पर असुर गयासुर का वध किया था।

तब से इस स्थान का नाम भारत के प्रमुख तीर्थस्थानो में आता है औरऔर बड़ी ही श्रद्धा और आदर से “गया जी” बोला जाता है।वैसे तो इसका भी शास्त्रीय समय निश्चित है, परंतु ‘गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं’ कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गई है।

धार्मिक मान्यता है की पितरों के खुश होने पर ही देवी-देवता खुश होते हैं। इस कारण से पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों की मुत्यु तिथि के अनुसार, उनका श्राद्ध करते है।