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गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन परिचय और रचनाएँ (Goswami Tulsidas)

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हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं।

तुलसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि थे। कवि तुलसीदास की प्रतिभा-किरणों से न केवल हिन्दू समाज और भारत, बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है।

तुलसीदास जी भारतीय हिन्दी साहित्य के सर्वोच्च कवि थे, जिन्हे भक्तिकाल के रामभक्ति शाखा के महानतम कवियों में गिना जाता था।

वे भगवान राम के अनन्य भक्त थे, जिन्हें अपनी पत्नी की धित्कारना के बाद वैराग्य हो गया और फिर उन्होंने भगवान राम की भक्ति में अपना शेष जीवन सर्मपित कर दिया और उनके उन्मुख हो गए ।

दुनिया के सार्वधिक लोकप्रिय एवं विद्धंत महाकवि तुलसीदास जी ने अपनी दूरदर्शी सोच, महान विचारों के माध्यम से हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र महाकाव्य रामचरितमानस एवं तमाम महान रचनाएं की और लोगों को एक आदर्श जीवन जीने के लिए प्रेरित किया साथ ही उन्हें नई सोच और अनुभव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास जी को भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि कहा है। तुलसीदास जी का अलंकार विधान भी बड़ा मनोहर है।

उन्होंने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग अधिक से अधिक किया है। तुलसीदास जी को गौतम बुद्ध के बाद सबसे बड़ा लोकनायक माना जाता है।

डॉ ग्रियर्सन ने इन्हें एशिया का सर्वोत्कृष्ट कवि कहा है गोस्वामी तुलसीदास एक महान हिंदू कवि होने के साथ-साथ संत, सुधारक और दार्शनिक भी थे।

जिन्होंने विभिन्न लोकप्रिय पुस्तकों की रचना की। उन्हें भगवान राम की भक्ति और महान महाकाव्य, रामचरितमानस के लेखक होने के लिए भी याद किया जाता है।

उन्हें हमेशा वाल्मीकि (संस्कृत और हनुमान चालीसा में रामायण के मूल असंगीतकार) के पुनर्जन्म के रूप में प्रशंसा मिली।

संस्कृत से वास्वतिक रामायण को अनुवादित करने वाले तुलसीदास जी हिन्दी और भारतीय तथा विश्व साहित्य के महान कवि हैं।

तुलसीदास के द्वारा ही बनारस के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर की स्थापना हुयी। अपनी मृत्यु तक वो वाराणसी में ही रहे। वाराणसी का तुलसी घाट का नाम उन्हीं के नाम पर पड़ा है।

राम के प्रति अथाह प्रेम की वजह से ही वे महान महाकाव्य रामचरित मानस के लेखक बने तुलसीदास जी ने खुद भी अपने जीवन के कई घटनाओं और तथ्यों का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है।

उनके जीवन के दो प्राचीन स्रोत भक्तमाल और भक्तिरसबोधिनी को क्रमश: नभादास और प्रियदास के द्वारा लिखा गया। नभादास ने अपने लेख में तुलसीदास को वाल्मिकी का अवतार बताया है।

तुलसीदास के निधन के 100 साल बाद प्रियदास नें उनपर अपना लेख लिखना शुरु किया और रामबोला के जीवन के सात चमत्कार और आध्यत्मिक अनुभवों का विवरण दिया।

तुलसीदास पर मुला गोसैन चरित्र और गोसैन चरित्र नामक दो जीवनायाँ 1630 में वेनी माधव और 1770 के लगभग दासनीदस (या भवनीदस) द्वारा लिखा गया।

हिंदी साहित्य में महाकवि तुलसीदास का युग सदा अमर रहेगा। वे भक्तकवि शिरोमणि थे। तुलसी ने लोकसंग्रह के लिए सगुण उपासना का मार्ग चुना और रामभक्ति के निरूपण को अपने साहित्य का उददेश्य बनाया।

तुलसीदास का भक्तिमार्ग वेदशास्त्र पर आधारित है। कवि के रूप में उन्होंने अपने साहित्य में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वेदन, दास्य, साख्य और आत्मनिवेदन इन सभी पक्षों का प्रतिपादन बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया

वाल्मिकी के अवतार

रामचरितमानस जैसे महाकाव्य को लिखने वाले तुलसीदास को वाल्मिकी का अवतार माना जाता है।

हिन्दू धर्मशास्त्र भविष्योत्तर पूर्णं के अनुसार, भगवान शिव ने अपनी पत्नी पार्वती से वर्णित किया है कि वाल्मिकी का अवतार फिर से कल युग में होगा।

मौजूद स्रोतों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि वाल्मिकी जी के मुख से रामायण को सुनने के लिये हनुमान जी खुद जाया करते थे।

रावण पर राम की विजय के बाद भी हनुमान हिमालय पर राम की पूजा जारी रखे हुए थे।

(रामबोला) तुलसीदास का जन्म कब हुआ

तुलसीदास की सही जन्मतिथि के विषय में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं ।

कुछ विद्वानों के अनुसार उनका जन्म 1554 में विक्रमी संवत के अनुसार हुआ था और अन्य कहते हैं कि यह 1532 था।

उन्होंने अपना जीवन 126 साल तक जीया। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म विक्रमी सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी, चंद्र के उज्जवल आधे में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित राजापुर (जिसे चित्रकूट के नाम से भी जाना जाता है) में हुआ था ।

जो यूपी में यमुना नदी के किनारे पर स्थित है।

तुलसी साहिब के आत्मोल्लेखों, राजापुर के सरयूपारीण ब्राह्मणों को प्राप्त “मुआफी’ आदि बहिर्साक्ष्यों और अयोध्याकांड (मानस) के तायस प्रसंग, भगवान राम के वन गमन के क्रम में यमुना नदी से आगे बढ़ने पर व्यक्त कवि का भावावेश आदि अंतर्साक्ष्यों तथा तुलसी-साहित्य की भाषिक वृत्तियों के आधार पर रामबहोरे शुक्ल राजापुर को तुलसी की जन्मभूमि होना प्रमाणित हुआ है।

एक किंवदंती के अनुसार, तुलसीदास को इस दुनिया में आने में 12 महीने लगे, तब तक वह अपनी मां के गर्भ में रहे।

उनके जन्म से 32 दांत थे और पांच साल के लड़के की तरह दिखते थे। अपने जन्म के बाद, उन्होंने रोने के बजाय राम के नाम का जाप करना शुरू कर दिया।

इसीलिए उनका नाम रामबोला रखा गया था । कहा जाता है कि तुलसीदास जी अभुक्त मूल नक्षत्र में पैदा हुए थे।

जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है। तुलसीदास की जन्म का दोहा

पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर |
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयो शरीर ||

रामबोला (तुलसीदास) के माता पिता

तुलसीदास के माता पिता के संबंध में भी कई प्रकार के मतभेद है।

प्राप्त सामग्रियों और प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे था।

किन्तु भविष्यपुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है।

रहीम के दोहे के आधार पर पिता का नाम आत्माराम दुबे व माता का नाम हुलसी बताया जाता है तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका में बताया है कि उनके जन्म के बाद चौथी रात, उनके पिता का निधन हो गया था।

तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में कवितावली और विनयपत्रिका में बताया था कि कैसे उनके माता-पिता ने उनके जन्म के बाद उनके माता-पिता ने अनिष्ट की आशंका से उनका परित्याग कर दिया।

ज्योतिषियों ने ‘अभुक्त मूल’ में जन्म लेने के कारण इन्हें माता-पिता के लिए अनिष्टप्रद बताया।

बालक के अनिष्ट की आशंका से इनकी माता ने इन्हें अपनी दासी चुनियां के साथ उसके ससुराल भेज दिया और दूसरे ही दिन इस संसार से चल बसीं।

तुलसीदास जी का पालन पोषण चुनिया नामक एक दासी ने बड़े लाड प्यार से तुलसीदास का पालन पोषण किया ।

तुलसीदास जी का बचपन बहुत ही कष्ट पूर्ण व बहुत ही संघर्षपूर्ण बीता।

किन्तु जब इनकी अवस्था साढ़े पांच वर्ष की थी, चुनिया (उनकी मां हुलसी की महिला नौकरानी) तुलसीदास को अपने शहर हरिपुर में ले गईं और उनकी देखभाल की।

महज साढ़े पांच साल तक उसकी देखभाल करने के बाद उसकी मौत हो गई। उस घटना के बाद, रामबोला एक गरीब अनाथ के रूप में रहता था और घर-घर जाकर भिक्षा माँगता था।

यह माना जाता है कि देवी पार्वती ने रामबोला की देखभाल के लिए एक ब्राह्मण का रूप धारण किया था।

जाति एवं वंश

जाति और वंश के सम्बन्ध में तुलसीदास ने कुछ स्पष्ट नहीं लिखा है। कवितावली एवं विनयपत्रिका में कुछ पंक्तियां मिलती हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वे ब्राह्मण कुलोत्पन्न थे-

दियो सुकुल जनम सरीर सुदर हेतु जो फल चारि को
जो पाइ पंडित परम पद पावत पुरारि मुरारि को ।

जाति-पांति न चहौं काहू का जाति-पांति,
मेरे कोऊ काम को न मैं काहू के काम को ।”

(विनयपत्रिका)


राजापुर से प्राप्त तथ्यों के अनुसार भी वे सरयूपारीण थे।

तुलसी साहिब के आत्मोल्लेख एवं मिश्र बंधुओं के अनुसार वे कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे।

जबकि सोरों से प्राप्त तथ्य उन्हें सना ब्राह्मण प्रमाणित करते है, लेकिन “दियो सुकुल जनम सरीर सुंदर हेतु जो फल चारि को’ के आधार पर उन्हें शुक्ल ब्राह्मण कहा जाता है।

परंतु शिवसिंह “सरोज’ के अनुसार सरबरिया ब्राह्मण थे।

ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने के कारण कवि ने अपने विषय में “जायो कुल मंगन’ लिखा है।

तुलसीदास का जन्म अर्थहीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जिसके पास जीविका का कोई ठोस आधार और साधन नहीं था। माता-पिता की स्नेहिल छाया भी सर पर से उठ जाने के बाद भिक्षाटन के लिए उन्हें विवश होना पड़ा।

तुलसीदास जी (Tulsidas) के गुरु

तुलसीदास के गुरु के रुप में कई व्यक्तियों के नाम लिए जाते हैं।

भविष्यपुराण के अनुसार राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ दास, सोरों से प्राप्त तथ्यों के अनुसार नरसिंह चौधरी तथा ग्रियर्सन एवं अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि तुलसीदास के गुरु थे।

राघवनंद के एवं जगन्नाथ दास गुरु होने की असंभवता सिद्ध हो चुकी है। वैष्णव संप्रदाय की किसी उपलब्ध सूची के आधार पर ग्रियर्सन द्वारा दी गई सूची में, जिसका उल्लेख राघवनंद तुलसीदास से आठ पीढ़ी पहले ही पड़ते हैं।

ऐसी परिस्थिति में राघवानंद को तुलसीदास का गुरु नहीं माना जा सकता।

सोरों से प्राप्त सामग्रियों के अनुसार नरसिंह चौधरी तुलसीदास के गुरु थे।

सोरों में नरसिंह जी के मंदिर तथा उनके वंशजों की विद्यमानता से यह पक्ष संपुष्ट हैं।

लेकिन महात्मा बेनी माधव दास के “मूल गोसाईं-चरित’ के अनुसार हमारे कवि के गुरु का नाम नरहरि है।

प्राप्त तथ्यों के आधार पर तुलसीदास जी के दो गुरु माने गए एक तो आध्यात्मिक गुरु और दूसरे हैं उनके शिक्षा गुरु जिन्होंने उन्हें शिक्षा प्रदान की।गुरु नरहरिदास की कृपा से तुलसीदास जी को राम भक्ति का मार्ग मिला बाबा नरहरिदास ही तुलसीदास जी के आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं।

तुलसीदास जी के शिक्षा गुरु काशी के शेष सनातन जी महाराज तुलसीदास के शिक्षा गुरु माने जाते हैं।

रामबोला (तुलसीदास) का अध्ययन

रामबोला (तुलसीदास) को विरक्त शिक्षा दी गयी (वैराग प्रारंभ के रुप में) जिसके बाद उनका नया नाम पड़ा ‘तुलसीदास’। जब ये सिर्फ 7 वर्ष के थे तो इनका उपनयन अयोध्या में नरहरिदास के द्वारा किया गया किया गया।

रामबोला ने अपनी शिक्षा अयोध्या से शुरु की। तुलसीदास ने बताया कि उनके गुरु ने महाकाव्य रामचरितमानस को कई बार उन्हें सुनाया।

15-16 साल की उम्र में रामबोला पवित्र नगरी वाराणसी आये जहाँ पर वे संस्कृत व्याकरण, हिन्दी साहित्य और दर्शनशास्त्र, चार वेद, छ: वेदांग, ज्योतिष आदि की शिक्षा अपने गुरु शेष सनातन से ली।

अध्ययन के बाद, अपने गुरु की आज्ञा पर वे अपनी जन्मस्थली चित्रकूट वापस आ गये जहाँ उन्होनें अपने पारिवारिक घर में रहना शुरु कर दिया और रामायण का व्याख्यान करने लगे।

एक बरगद के पेड़ के नीचे माघ मेला में तुलसीदास ने भारद्वाज (स्रोता) और याज्ञवल्क्य मुनि के भी दर्शन का उल्लेख किया है।

तुलसीदास जी का विवाह

ब्राह्मण परिवार में जन्मे तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जन्म के बाद प्रथम शब्द राम का उच्चारण किया था।

इसी कारण इनका नाम रामबोले पड़ गया। बचपन से ही तुलसीदास का मन पूजा-पाठ में अधिक था।

इनकी अल्पायु में किसी को तनिक भी अभास नहीं हो सकता था कि वे एक दिन भगवान राम के सबसे बड़े आधुनिक भक्त कहलाएँगे।

यद्यपि जिस प्रकार हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, ठीक ऐसा ही तुलसीदास के साथ भी हुआ। रामबोले को संत तुलसीदास बनाने का श्रेय उनकी पत्नी रत्नावली को दिया जा सकता है।

तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। तुलसीदास पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे, परंतु रत्नावली ने तुलसीदास को प्रेम और मोह के बीच का अंतर समझाया।

हुआ यूँ कि नई-नई दुल्हन बन कर आई रत्नावली मायके गई हुई थी। रत्नावली के बिना तुलसीदास को घर में न नींद आ रही थी, न चैन। इसी कारण तुलसीदास देर रात अपने घर से निकल पड़े और रत्नावली से मिलने अपने ससुराल पहुँच गए।

तुलसीदास चुपचाप रत्नावली के कमरे में दाखिल हुए, तब रत्नावली ने बहुत ही तीखा कटाक्ष किया,

‘लाज न आई आपको, दौरे आएहु नाथ।
अस्थि चर्ममय देह यह, ता सौं ऐसी प्रीति ता।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत बीता।’

अर्थात् रत्नावली ने तुलसीदास से कहा, ‘इतनी रात गए चुपचाप मेरे मायके आने में आपको लाज नहीं आई।

हड्डी-चमड़ी की इस देह की बजाए राम से इतनी प्रीति करते, तो भव पार उतर जाते।

रत्नावली के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल डाली और वे राम भक्ति में ऐसे डूबे कि उनके अनन्य भक्त बन गए। इस तरह पत्नी के एक ताने ने साधारण रामबोले को महान संत बनने की ओर अग्रसर किया।

हनुमान ने दिए थे साक्षात् दर्शन

तुलसीदास जी को अब बस श्री राम की लगन लग गई। वे सोते-जागते हर वक्त राम की भक्ति में लीन रहते और चित्रकूट के अस्सी घाट पर अपनी रामभक्ति में महाकाव्य “रामचरितमानस” लिखने लगे।

कहते हैं कि ये काव्य लिखने का मार्गदर्शन उन्हें श्री हनुमान जी ने दिया था।

तुलसीदास जी ने अपने कई रचनाओं में उल्लेख भी किया है कि भगवान राम के प्रबल भक्त हनुमान जी से उन्होनें कई बार मुलाकात भी की इसके साथ ही उन्होनें वाराणसी में भगवान हनुमान के लिए संकटमोचन मंदिर की भी स्थापना भी थी।

वहीं तुलसीदास जी के मुताबिक हनुमान जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया इसलिए उन्हें भगवान राम के दर्शन प्राप्त हुए।

ऐसी मान्यता है कि तुलसीदास को हनुमान, भगवान राम-लक्ष्मण और शिव-पार्वतीजी के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए थे।

अपनी यात्रा के समय तुलसीदास जी को काशी में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमानजी का पता बताया। हनुमानजी के दर्शन करने के बाद तुलसीदास ने भगवान राम के दर्शन कराने की प्रार्थना की।

तुलसीदास को श्री राम ने दिए अपने दिव्य दर्शन

एक बार जब वो कमदगीरि पर्वत की परिक्रमा करने गये थे उन्होंने घोड़े की पीठ पर दो राजकुमारों को देखा लेकिन वे उनमें फर्क नहीं कर सके।

बाद में उन्होंने पहचाना कि वो हनुमान की पीठ पर राम-लक्ष्मण थे, वे दुखी हो गये। इन सारी घटनाओं का उल्लेख उन्होंने अपनी रचना गीतीवली में भी किया है।

इसके बाद फिर मौनी अमावस्या के दिन पुन: भगवान श्रीराम के दर्शन हुए।

भगवान राम ने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा, ‘बाबा ! हमें चंदन चाहिये। क्या आप हमें चंदन दे सकते हैं ?’ हनुमान जी ने सोचा कि कहीं तुलसीदास इस बार भी धोखा न खा जायें।

इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण कर दोहे में बोल कर इशारा किया।

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

तुलसीदास श्रीराम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गए। भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चंदन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गए।

गोस्वामीजी की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय पाया जाता है।

इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त थे।

दीक्षा से आरंभ हुई ‘हरि कथा अनंता’

कहते हैं कि भगवान शंकर की प्रेरणा से रामशैल पर रहने वाले श्री अनंतानंदजी के प्रिय शिष्य नरहर्यानंदजी (नरहरि बाबा) रामबोले की खोज में निकले और उन्हें ढूँढ निकाला।

नरहरि बाबा ने ही तुलसीदास का नाम रामबोले रखा। नरहरि बाबा 29 वर्षीय तुलसीदास को लेकर अयोध्या पहुँचे और विक्रम संवत 1561 में माघ शुक्ल पंचमी शुक्रवार को उन्हें दीक्षा दी।

बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये।

इसके बाद नरहरि स्वामी ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके रामबोला को राममन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या ही में रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी।

एक बार गुरुमुख से जो सुन लेते थे, उन्हें वह कंठस्थ हो जाता था। वहाँ से कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ श्री नरहरि जी ने तुलसीदास को रामचरित सुनाया।

कुछ दिन बाद वह काशी चले आये। काशी में शेषसनातन जी के पास रहकर तुलसीदास ने पन्द्रह वर्ष तक वेद-वेदांग का अध्ययन किया। इधर उनकी लोकवासना कुछ जाग्रत् हो उठी और अपने विद्यागुरु से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि को लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है।

उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदि का श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे। इधर पण्डितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई।

वे दल बाँधकर तुलसीदास जी की निन्दा करने लगे और उस पुस्तक को नष्ट कर देने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भेजे।

चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो वीर धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्ण के थे।

उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया, पुस्तक अपने मित्र टोडरमल के यहाँ रख दी।

इसके बाद उन्होंने एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की जाने लगीं।

पुस्तक का प्रचार दिनों दिन बढ़ने लगा। इधर पण्डितों ने और कोई उपाय न देख श्रीमधुसूदन सरस्वती जी को उस पुस्तक को देखने की प्रेरणा की।

श्रीमधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर यह सम्मति लिख

आनन्दकानने ह्यास्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥

निर्धनता और कष्टों से भरे जीवन में जगाई राम धुन

इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता। तुलसीदास का बचपन बड़े कष्टों में बीता।

माता-पिता दोनों चल बसे और इन्हें भीख मांगकर अपना पेट पालना पड़ा था। इसी बीच इनका परिचय राम-भक्त साधुओं से हुआ और इन्हें ज्ञानार्जन का अनुपम अवसर मिल गया।

पत्नी के व्यंग्यबाणों से विरक्त होने की लोकप्रचलित कथा को कोई प्रमाण नहीं मिलता।

तुलसी भ्रमण करते रहे और इस प्रकार समाज की तत्कालीन स्थिति से इनका सीधा संपर्क हुआ।

इसी दीर्घकालीन अनुभव और अध्ययन का परिणाम तुलसी की अमूल्य कृतियां हैं, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए तो उन्नायक सिद्ध हुई ही, आज भी जीवन को मर्यादित करने के लिए उतनी ही उपयोगी हैं।

तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 39 बताई जाती है। इनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली, गीतावली, जानकीमंगल, हनुमान चालीसा, बरवै रामायण आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

अपने दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास जी ने कुल 22 कृतियों की रचना की है जिनमें से पाँच बड़ी एवं छः मध्यम श्रेणी में आती हैं।

इन्हें संस्कृत विद्वान् होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ कवियों में एक माना जाता है।

तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदिकाव्य रामायण के रचयिता थे। उनकी अंतिम कृति विनय पत्रिका थी।

तुलसीदास जी की काव्यगत विशेषताएं

तुलसी साहित्य में लोकहित, लोकमंगल की प्रखर भावना दिखाई देती है। तुलसी ने अपने समय में प्रचलित अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं को अपनाया है। समन्वयवाद तुलसीदास जी की भक्ति भावना का सबसे बड़ा गुण है।

उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है बल्कि ग्रहस्थ और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण तथा पुराण और काव्य का समन्वय भी दिखाई देता है।

तुलसीदास जी के राम माननीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं। जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, विनय तथा त्याग जैसे आदर्शों को प्रतिष्ठित किया है। तुलसीदास जी को हिंदी का जातीय कवि कहा जाता है।

तुलसीदास जी को समन्वय का कवि भी कहा जाता है। नाभा दास ने तुलसी दास को कलिकाल का वाल्मीकि कहा है।

भक्ति भावना

तुलसीदास के काव्य की प्रथम विशेषता उसमें निहित आदर्श भक्ति-भावना का है।

उन्होंने अपने काव्य में राम को अपना इष्टदेव घोषित किया है तथा उनके प्रति दास्य-भाव की भक्ति को दर्शाया है। वे अपने इष्ट देव राम को खरा एवं बड़ा कहते हैं तो स्वयं को खोटा व छोटा बताते हैं।

समन्वय की भावना

यद्यपि तुलसीदास राम के उपासक हैं परन्तु उनकी समन्वय की भावना ने अन्य देवी-देवताओं की महत्ता को स्वीकार किया है। यथा वे शिव की महिमा को दर्शाने के लिए अपने उपासक राम के मुख से कहलवाते हैं

रस भावना

तुलसीदास के काव्य में वैसे तो शांत रस का भक्ति रस का प्राधान्य है। परंतु उसमें अन्य रसों यथा- वीर रस, रौद्र रस, भयानक रस, श्रृंगार रस का भी समावेश हुआ है। परंतु उन्होंने अपने काव्य में मर्यादित ढंग से ही श्रृंगार वर्णन किया है।

महत्वपूर्ण स्थलों का विस्तृत वर्णन

तुलसीदास लोक मर्यादा के कवि हैं। उन्होंने समाज के समक्ष आदर्श संबंध, आदर्श मित्रता, आदर्श भाईचारा आदि को प्रस्तुत करने के लिए रामकथा के महत्वपूर्ण स्थलों का विस्तृत व हृदयस्पर्शी चित्रण किया है।

उदाहरण के लिए राम-वन-गमन, चित्रकूट में राम-भरत-मिलाप, सीता-हरण, लक्ष्मण-मूर्छा आदि प्रसंगों में कवि ने एक-एक भाव को चित्रित किया है।

विविध काव्य-रूप

तुलसीदास ने अपने काव्य को विविध रूपों यथा- महाकाव्य, खंड-काव्य, मुक्तक-काव्य आदि में प्रस्तुत किया है। रामचरितमानस जहां महाकाव्य की श्रेणी में आता है, वहीं जानकी-मंगल, पार्वती-मंगल आदि खंडकाव्य के अंतर्गत आते हैं।

तुलसीदास का साहित्यिक जीवन

तुलसीदास ने तुलसी मानस मंदिर पर चित्रकूट में स्मारक बनवाया है। इसके बाद वे वाराणसी में संस्कृत में कविताएँ लिखने लगे।

ऐसा माना जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने तुलसीदास को अपनी कविताओं को संस्कृत के बजाय मातृभाषा में लिखने का आदेश दिया था।

ऐसा कहा जाता है कि जब तुलसीदास ने अपनी आँखे खोली तो उन्होंने देखा कि शिव और पार्वती दोनों ने उन्हें अपना आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे अयोध्या जाकर अपनी कविताओं को अवधि भाषा में लिखे।

हिन्दी साहित्य उनकी काव्य प्रतिभा के अक्षय प्रकाश से सदैव प्रकाशित रहेगा।

तुलसीदास जी की हस्तलिपि अत्यधिक सुन्दर थी ,लगता है जैसे उस युग में उन्होंने कैलोग्राफी की कला आती थी।

उनके जन्म-स्थान राजापुर के एक मन्दिर में श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड की एक प्रति सुरक्षित रखी हुई है।

गोस्वामी तुलसीदास का कलापक्ष

तुलसी दास जी ने अपने युग में प्रचलित सभी काव्य शैलियों का सफलता पूर्वक प्रयोग किया है।

जैसे-दोहा, चौपाई, कविता सवैया, छप्पय आदि। अलंकार उनके काव्य में सुन्दर व स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हुए हैं । राम चरित मानस अवधी भाषा का सर्वोत्तम ग्रन्थ है।

गोस्वामी तुलसीदास का केन्द्रीय भाव

संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने अपने दोहो के माध्यम से मानव समाज को नीति की राह में चलने का उपदेश दिया है।

जीवन को सफल बनाने के क्या तरीके हो सकते हैं? मीठे बचन बोलने से क्या लाभ होता है तथा काम, क्रोध, लोभ और मोह के वशीभूत व्यक्ति को क्या नुकसान होता है आदि उपदेशात्मक नीति वचनों के माध्यम से समाज के विकास में उन्होंने अपूर्व सहयोग प्रदान किया है।

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी रचनाएँ

लगभग चार सौ वर्ष पूर्व गोस्वामी जी ने अपने काव्यों की रचना की। आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुंच चुका था।

यह उनके कवि रुप में लोकप्रिय होने का प्रमाण है। मानस के समान दीर्घकाय ग्रंथ को कंठाग्र करके सामान्य पढ़े लिखे लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हो जाने लगे थे।

तुलसीदास जी ने अवधी एवं ब्रजभाषा दोनों में काव्य रचना की। रामचरितमानस अवधी में लिखा तो विनयपत्रिका, दोहावली, कवितावली आदि में ब्रजभाषा का प्रयोग किया। उन्होंने सभी शैलियों में काव्य लिखे।

प्रमुख रचनाएं

1.महाकाव्य रामचरितमानस की रचना

रामचरितमानस, महाकवि तुलसीदास जी का सबसे प्रसिद्ध एवं हिन्दू धर्म का सबसे पवित्र महाकाव्य है। जिसकी रचना वाल्मीकि जी के अवतार माने जाने वाले एवं हिन्दी साहित्य के सर्वोत्तम कवि तुलसीदास जी ने अयोध्या में की थी।

आपको बता दें कि महाकवि तुलसीदास जी ने इस पवित्र ग्रंथ को हिन्दू कैलेंडर के चैत्र महीने के रामनवमी में लिखना शुरु किया था, उन्होंने इस महाकाव्य को करीब 2 साल, 7 महीने 26 दिन में लिखा था।

महाकवि तुलसीदास जी की अपने प्रभु मर्यादित पुरुषोत्तम राम के प्रति गहरा आस्था और भक्ति थी। उन्होंने भगवान राम की भक्ति में डूबकर रामचरितमानस में भगवान श्री राम का एक आदर्श चरित्र का बेहद खूबसूरत तरीके से वर्णन किया है।

भारतीय साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास जी ने हिंदू ग्रंथ के इस महाकाव्य की रचना अवधि भाषा में बेहद आसान तरीके से की है।

रामचरितमानस ने दोहा-चौपाईओं के माध्यम से भगवान राम के जीवन के समस्त दर्शन को बेहद सौम्यता एवं प्रेम भाव से अपनी कृतियों में दर्शाया है।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि रामायण के मूल रचियता महर्षि वाल्मीकि जी माने जाते हैं, लेकिन वाल्मीकि जी द्धारा रचित रामायण को सिर्फ उच्च कोटी के विद्धान ही समझ पाते थे।

जिसके बाद तुलसीदास जी ने इस महाकाव्य में भगवान राम की आदर्श जीवन गाथा का बेहद सरल शब्दों में उल्लेख किया है, जिससे रामचरितमानस पढ़ना हर व्यक्ति के लिए आसान हो गया है।

महाकाव्य श्रीरामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वाँ स्थान दिया गया। तुलसीदास जी रामानंदी के बैरागी साधु थे।

रामचरितमानस की कथा के वक्ता तीन हैं

शिव,याज्ञवल्क्य और काकभुशुंडि। श्रोता हैं पार्वती, भरद्वाज और गरुड़। इन तीनों श्रोताओं ने अपना यह मोह प्रकट किया है कि कहीं राम मनुष्य तो नहीं हैं।

तीनों वक्ता जो कथा कह रहे हैं, वह इसी मोह को छुड़ाने के लिए। इसलिए कथा के बीच बीच में याद दिलाते जाना बहुत उचित है। गोस्वामीजी ने भूमिका में ही इस बात को स्पष्ट करके शंका की जगह नहीं छोड़ी है।

(2) रामचरितमानस एक प्रबन्ध काव्य है, जिसमें कथा का प्रवाह अनेक घटनाओं पर से होता हुआ लगातार चला चलता है।

इस दशा में कथाप्रवाह में मग्न पाठक या श्रोता को असल बात की ओर ध्यादन दिलाते रहने की आवश्यकता समय समय पर उस कवि को अवश्य मालूम होगी,जो नायक को ईश्वरावतार के रूप में ही दिखाना चाहता है।

फुटकर पद्यों में इसकी आवश्यकता न प्रतीत होगी। सूरसागर की शैली पर तुलसी की’गीतावली’ है। उसमें यह बात नहीं पाई जाती। जबकि समान शैली की रचना मिलती है, तब मिलान के लिए उसी को लेना चाहिए।

(3) श्रीकृष्ण के लिए ‘हरि’, ‘जनार्दन’ आदि विष्णुवाचक शब्द बराबर लाए जाते हैं, इससे चेतावनी की आवश्यकता नहीं रह जाती। गोपियों ने कृष्ण के लिए बराबर ‘हरि’ शब्द का व्यवहार किया है।

गीतावली

हिन्दी साहित्य के महाकवि तुलसीदास जी की यह रचना उनके सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है,गीतावली एक गीतिकाव्य है। जिसे उन्होंने ब्रज भाषा में लिखा है। गीतावली में तुलसीदास जी ने पद्य रचना के माध्यम से मानव जीवन में प्रेम और भाईचारे का भावनात्मक तरीके से वर्णन किया है।

रामललानहछू

महाकवि तुलसीदास जी की रामलालनहछू उनके द्धारा रचित लघु रचनाओं में से एक है, जिसे उन्होंने अवधि भाषा में लिखा है राम लला नहछू प्रबंध काव्य व लोग गीत शैली पर आधारित रचना है।

वैराग्य संदीपनी

वैराग्य संदीपनी एक प्रबंध काव्य है।भगवान राम के परम भक्त और हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि तुलसीदास जी ने अपनी यह रचना में दोहा और चौपाइयां द्धारा की है, इसमें उन्होंने भक्ति-सुख का उपदेश दिया है।

पार्वती-मंगल

यह रचना महाकवि तुलसीदास जी द्धारा रचित एक मशहूर रचनाओं में से एक है, जिसमें उन्होंने बेहद शानदार ढंग से माता पार्वती एवं भगवान शंकर का विवाह, उनकी प्रेम साधना, तप, अदम्य निष्ठा आदि का बेहद सौम्यता से मनोरम वर्णन किया है।

यह रचना तुलसीदास जी के प्रबंध काव्य की रचनाएं है।पार्वती-मंगल यह तुलसी की प्रामाणिक रचना प्रतीत होती है। इसकी काव्यात्मक प्रौढ़ता तुलसी सिद्धांत के अनुकूल है।

कविता सरल, सुबोध रोचक और सरस है। “”जगत मातु पितु संभु भवानी”” की श्रृंगारिक चेष्टाओं का तनिक भी पुट नहीं है। लोक रीति इतनी यथास्थिति से चित्रित हुई है कि यह संस्कृत के शिव काव्य से कम प्रभावित है और तुलसी की मति की भक्त्यात्मक भूमिका पर विरचित कथा काव्य है।

व्यवहारों की सुष्ठुता, प्रेम की अनन्यता और वैवाहिक कार्यक्रम की सरसता को बड़ी सावधानी से कवि ने अंकित किया है।

तुलसीदास अपनी इस रचना से अत्यन्त संतुष्ट थे, इसीलिए इस अनासक्त भक्त ने केवल एक बार अपनी मति की सराहना की है –

प्रेम पाट पटडोरि गौरि-हर-गुन मनि।
मंगल हार रचेउ कवि मति मृगलोचनि।।

जानकी-मंगल

महामहिम तुलसीदास जी ने अपनी इस कृति में मर्यादित पुरुर्षोत्तम श्री राम एवं माता सीता के विवाह का बेहद सुंदर ढंग से व्याख्या की है।

इसमें कवि तुलसीदास जी ने माता सीता के स्वयंवर की तैयारियों से लेकर भगवान राम के द्धारा शक्तिशाली धनुष तोड़ने एवं माता सीता के अयोध्या नगरी और राजा दशरथ के महल में पहुंचने तक का विस्तृत रुप से वर्णन किया है।

विद्वानों ने इसे तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाओं में स्थान दिया है। पर इसमें भी क्षेपक है।

पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा लिए।
डाँटहि आँखि देखाइ कोप दारुन किए।।
राम कीन्ह परितोष रोस रिस परिहरि।
चले सौंपि सारंग सुफल लोचन करि।।
रघुबर भुजबल देख उछाह बरातिन्ह।
मुदित राउ लखि सन्मुख विधि सब भाँतिन्ह।।

तुलसी के मानस के पूर्व वाल्मीकीय रामायण की कथा ही लोक प्रचलित थी।

काशी के पंडितों से मानस को लेकर तुलसीदास का मतभेद और मानस की प्रति पर विश्वनाथ का हस्ताक्षर संबंधी जनश्रुति प्रसिद्ध है।

रामाज्ञा प्रश्नावली

रामाज्ञा प्रश्नावली एक ज्योतिष विषयक ग्रंथ है जो ज्योतिष विषय से संबंधित है।कवि तुलसीदास जी की यह रचना दोहों, सर्गों और सप्तकों में लिखी गई है।

इसमें कवि ने रामकथा के कई शुभ और अशुभ प्रसंगों की मिश्रित रुप से व्याख्या की है है।

दोहावली

भारतीय हिन्दी के महामहिम तुलसीदास जी अपनी इस रचना को करीब 573 दोहों के माध्यम से लिखा है।

महाकवि तुलसीदास जी ने अपनी इस कृति में भक्ति और प्रेम की बेहद शानदार ढंग से व्याख्या की है।दोहावली तुलसीदास जी का एक मुक्तक काव्य है।

कवितावली

हिन्दी साहित्य के महाकवि तुलसीदास जी की यह एक सार्वधिक लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।

ब्रज भाषा में रचित इस काव्य की रचना कवि ने चौपाईयां, छंदों और सवैया के माध्यम से की है।कवितावली एक मुक्तक काव्य है और कवितावली की रचना भी तुलसीदास जी ने ब्रज भाषा में की है।

श्रीकृष्ण गीतावली

श्रीकृष्ण गीतावली भी गोस्वामी जी की रचना है। श्रीकृष्ण-कथा के कतिपय प्रकरण गीतों के विषय हैं।

कृष्ण गीतावली एक गीतिकाव्य है जो वृंदावन की यात्रा के अवसर पर तुलसीदास जी ने लिखा है हिन्दी साहित्य के महामहिम गोस्वामी तुलसीदास जी की ब्रज भाषा में रचित उनकी प्रसिद्ध कृतियों में से एक हैं।

तुलसीदास जी की इस मशहूर रचना को करीब 61 पदों के माध्यम से लिखा है, इसमें उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का बेहद मनोहम ढंग से वर्णन किया है

हनुमानबाहुक

गोस्वामी तुलसीदास जी की यह रचना उनकी हनुमान भक्ति को दर्शाती है। यह एक स्वतंत्र रचना है। इसके सभी अंश प्रामाणिक प्रतीत होते हैं।

हनुमान बाहुक उन्होंने तब लिखा था, जब वह बेहद बीमार थे और काफी शारीरिक वेदना सह रहे थे, तब उन्होंने भगवान हनुमान की बिना किसी स्वार्थ के ईमानदारी से भक्ति की, जिसके बाद महाकवि के सारे कष्टों का समाधान हो गया।

वहीं इसके बारे में यह मान्यता है कि हनुमानबाहुक का पाठ जपने से मनुष्य की हर मनोकामना पूर्ण होती है।

विनय पत्रिका

विनय पत्रिका तलुसीदास जी द्धारा रचित उनकी प्रसिद्ध कृतियों में से एक है, जिसे उन्होंने बेहद शानदार ढंग से ब्रज भाषा में लिखा है।

विनय पत्रिका, महाकवि तुलसीदास जी के करीब 279 स्त्रोत गीतों का संग्रह है, जिसमें भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश, हनुमान, माता सीता, गंगा मैया, यमुना, काशी, श्री राम की स्तुतियां हैं।

विनय पत्रिका एक गीतिकाव्य है। विनय पत्रिका के माध्यम से तुलसीदास जी ने राम के दरबार में अपनी अर्जी प्रस्तुत की हैं।

विनय पत्रिका में विनय व आत्मनिवेदन के पद हैं। विनय पत्रिका की रचना तुलसीदास जी ने ब्रज भाषा में की है।

इस कृति को तुलसीदास जी ने स्त्रोत और पदों के माध्यम से लिखा हैं। कवि की इस रचना में भक्ति एवं शांत रस स्पष्ट दिखाई देता है। विनय पत्रिका में विनय के पद हैं, इसलिए इसे राम विनयावली के नाम से भी जाना जाता है।

बरवै रामायण

बरवै रामायण यह एक मुक्तक काव्य है जो तुलसीदास जी ने रहीम के अनुरोध पर लिखा था।

सतसई

सतसई कवि तुलसीदास जी की प्रमुख रचनाओं में से एक हैं, जिसे उन्होंने दोहो और छंद के माध्यम से लिखा है। तुलसीदास जी की इस रचना में 700 से ज्यादा दोहे हैं।

सतसई में दोहों के साथ-साथ सोरठा और बरवै छंद का भी इस्तेमाल किया गया है। ‘सतसई’ के कुछ दोहे उनकी रचना ‘दोहावली’ से भी मिलते हैं। इस रचना में श्रंगार रास का कवि तुलसीदास जी ने भरपूर इस्तेमाल किया है।

महाकवि तुलसीदास जी द्वारा अन्य रचित ग्रंथ –

  1. छंदावली रामायण
  2. कुंडलिया रामायण
  3. राम शलाका
  4. संकट मोचन
  5. करखा रामायण
  6. रोला रामायण
  7. झूलना
  8. छप्पय रामायण
  9. कवित्त रामायण
  10. कलिधर्माधर्म निरुपण

हनुमान चालीसा: इसमें 40 पद है जो अवधि भाषा में हनुमान जी को समर्पित है साथ ही इसमें 40 चौपायाँ और 2 दोहे भी है।

संकटमोचन हनुमानाष्टक : इसमें अवधि में हनुमान जी के लिए 8 पद है।

हनुमानबाहुक: इसमें 44 पद है जो हनुमान जी के भुजाओं का वर्णन कर रहा है।

तुलसीदास जी के विश्व प्रसिद्ध दोहे

हमारे यहां कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने देश वासियों को एक अलग दिशा दिखाई है।

इन महापुरुष के विचारों ने समय -समय पर देश के लोगों को नई ऊर्जा और सोच का अनुभव कराया है।

इन महापुरुषों की दूरदर्शिता और ऊर्जावान विचार आज भी लोगों को एक नई राह दिखाने का सामर्थ्य रखते हैं।

ऐसे ही सकारात्मक ऊर्जा से भरे और प्रेरणाप्रद विचार रखने वाले महापुरुषों में एक हैँ गोस्वामी तुलसीदास।

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।

तुलसीदास जी कहते हैं कि किसी भी विपदा से यह 7 गुण आपको बचाएंगे- 1:विद्या 2: विनय, 3:विवेक, 4:साहस, 5:आपके भले कर्म, 6: सत्यनिष्ठा और 7:भगवान के प्रति आपका विश्वास।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।

बहादुर व्यक्ति अपनी वीरता युद्ध के मैदान में शत्रु के सामने युद्ध लड़कर दिखाते हैं और कायर व्यक्ति लड़कर नहीं बल्कि अपनी बातों से ही वीरता दिखाते
हैं।

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।

जिस समूह में शिरकत होने से वहां के लोग आपसे खुश नहीं होते और वहां लोगों की नजरों में आपके लिए प्रेम या स्नेह नहीं है, तो ऐसे स्थान या समूह
में हमें कभी शिरकत नहीं करना चाहिए, भले ही वहां स्वर्ण बरस रहा हो।

तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुं ओर।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।


तुलसीदास जी कहते हैं कि मधुर वाणी सभी ओर सुख का वातावरण पैदा करती हैं। यह हर किसी को अपनी और सम्मोहित करने का यही एक कारगर मंत्र है इसलिए हमें कटु वाणी त्याग कर मधुरता से बातचीत करना चाहिए।

तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए।


तुलसीदास कहते हैं, भगवान पर भरोसा करें और किसी भी भय के बिना शांति से सोइए। कुछ भी अनावश्यक नहीं होगा, और अगर कुछ अनिष्ट घटना ही,है तो वो घटकर ही रहेगी इसलिए बेकार की चिंता और उलझन को छोड़कर मस्त रहना चाहिए।

तुलसीदास जी का निधन

तुलसीदास के काफी सालों से बीमार रहने के चलते उन्होनें राम भक्ति में तीर्थ स्थानों का भ्रमण करते हुए संवत 1680 अर्थात सन 1623 ईस्वी में काशी के गंगा घाट पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास जी ने अपनी देह त्याग दी ।

अपने अंतिम समय गंगा नदी के किनारे अस्सी घाट पर तुलसीराम ने राम-नाम का स्मरण किया था वहीं ऐसा कहा जाता है कि तुलसीदास ने अपने मृत्यु से पहले आखिरी कृति विनय-पत्रिका लिखी थी जिस पर खुद प्रभु राम ने हस्ताक्षर किए थे।

तुलसीदास जी की मृत्यु के संबंध में एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है जो इस प्रकार से है:-

संवत सोलह सो अस्सी,
असी गंग के तीर,
श्रावण शुक्ला सप्तमी,
तुलसी तज्यो शरीर।

अर्थात संवत 1680 में गंगा के तट पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास जी ने अपना शरीर त्याग दिया।

तुलसीदास किस काल के कवि थे ?

तुलसीदास भक्तिकाल काल के कवि थे |

तुलसीदास के पत्नी का नाम क्या था?

तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था।