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भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौशल्या हितकारी

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भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला, कौशल्या हितकारी।
हर्षित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप विचारी॥ १ ॥

लोचन अभिरामा, तनु घनश्यामा, निज आयुध भुज चारी।
भूषण गल माला, नयन विशाल, शोभासिंधू खरारी॥ २ ॥

कह दुई कर जोरी, अस्तुति तोरी, कही बिधि करू अनंता।
माया गुण ज्ञानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता॥ ३ ॥

करुना सुखसागर, सुब गुण आगर, जेहि गावाहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयौ प्रगट श्रीकंता॥ ४ ॥

ब्रमांड निकाय, निर्मित माया, रोम रोम प्रति वेद कहे।
मुम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहे॥ ५ ॥

उपजा जब गयाना, प्रभु मुस्काना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहे।
कही कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सूत प्रेम लाहे॥ ६ ॥

माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा।
कीजै शिशु लीला, अति प्रियशीला, यह सुख परम अनूप॥ ७ ॥

सुनी वचन सुजाना, रोदन ठाना, होई बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावही, हरिपद पावही, तेहिं ना परहिं भवकूपा॥ ८ ॥

दोहा :-
विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार |
निज इच्चा निर्मित तनु माया गुण गोपार ||

Source

Ramayan Choupai